Tuesday, 29 May 2018

कविता और मैं



दोस्तों,
मेरा अपना मानना है कि किसी कवि को आप कोई एक शीर्षक देकर उससे उस निश्चित शीर्षक पर कविता नहीं लिखवा सकते. हालाँकि कवि कोशिश करके लिख भी देगा लेकिन उस कविता में उसका कवि हृदय शामिल न हो पायेगा. जब आपको कोई टोपिक दिया जाता है और उस पर रचना  (कविता) बनानी होती है तो वह (कविता) केवल शब्दों का ढेर होकर रह जाती है. इस प्रकार के काव्य में आप केवल कोशिशें करते  रहते  हैं कि शब्द सही से जच जाये.

एक बार मैने किसी प्रसिद्ध कवियित्री को ईमेल किया था कि कविता जानबूझ कर लिखी नहीं जाती वो सिर्फ पैदा होती है कब,किस जगह और किस टोपिक पर पैदा होगी कोई नहीं बता सकता.
आप एक बार सोचें कि ऐसी रचना को रचते वक्त क्या आप वो लिख रहे थे जो आप का दिल कह रहा था या आपने अपने दिमाग के माध्यम से वो लिखा जो टॉपिक के अंतर्गत आ रहा है...दोनों में बहुत अंतर है...
मैं ये कतई नही कहता कि दिए गये टॉपिक पर कोई रचना नहीं बन सकती
दिए गये टॉपिक पर लिखा जा सकता है लेकिन काव्य नही, लेख/सुलेख लिखा जा सकता है...
इसीलिए कवि या शायर खुद को पागल कह सकते हैं लेकिन एक लेखक अपने आप को पागल कहने की भूल कभी नहीं करेगा. क्यूंकि लेख लिखते वक्त आपको टॉपिक के बारे में पहले जानकारी होनी चाहिए कि किस टॉपिक पर लिखना है उससे सम्बन्धित आंकड़े,तथ्य,विवरण आपके पास होने चाहिए या याद होना जरूरी है.

तो क्या मैंने जो तर्क गढ़ा है,उसके आलोक में हिंदी के उन महान कवियों यथा दिनकर (टॉपिक - कर्ण ), मैथिलीशरण गुप्त ( टॉपिक - यशोधरा ) जयशंकर प्रसाद ( टॉपिक - मनु, श्रृद्धा, इडा आदि ) की महान कृतियों का अवलोकन करें तो वो निरा शब्दों का ढेर ही मानी जाएगी... मेरी खुद की रचना आजादी रो दीवानों:  सागरमल गोपा (३ नवम्बर १९०० -४ अप्रैल १९४६) भी क्या शब्दों का ढेर है .... "नहीं" ऐसा नहीं है. 
क्यूंकि न ही दिनकर जी को किसी अन्य ने सुझाव दिया होगा कि आप "कर्ण" टॉपिक पर लिखें...ना ही गुप्त जी को किसी ने सुझाव या दबाव दिया होगा कि आप "यशोधरा" पर लिखें...ना ही इन्होने ये चाह कर  कि मुझे इस फलाने टॉपिक पर कविता बनानी है;लिखी होगी ... बस इनको अचानक अंतरात्मा से प्रेरणा मिली होगी और इनसे ये रचनाएँ लिखी गयीं.

आपने भी छोटी कक्षाओं से लेकर विश्वविद्यालय की शिक्षा तक अक्सर ये देखा होगा कि कोई टॉपिक देकर हमेशा निबन्ध ही लिखवाए जाते हैं,कविताएँ नहीं.

तो क्या कविता रचने की प्रेरणा,जज्बात और भाव अंतरात्मा से अचानक से मिलते हैं और अचानक से कविता रच दी जाती है??
"नहीं"   ऐसा भी नहीं है. कोई भी रचना की शुरुवात इस प्रेरणा और जज्बातों के अंतर्गत कर दी जाती है अगर कोई रचना छोटी बन पा रही है तो वो रचना इसके अंतर्गत पूर्ण भी हो जाती है  लेकिन रचना जब लम्बी हो तो उसमे समय भी अधिक लगता है लेकिन कवि को उसमे लगा रहना पड़ता है तथा उसके जज्बातों और जज्बे की एक लय  और एक लहर बन जाती है जिसके वशीभूत होकर एक रचना पूर्णता की और खिचीं चली जाती है.
और फिर बाद में रचना के भाव बदले बिना इसमें कोई सुधार करना हो तो किया भी जाता है.
 जब कोई कवि किसी सुनिश्चित टॉपिक पर लिखने की अथाह मेहनत करता है तो यही मानसिक मेहनत उसके कवि मन की तथा अविरल भावों का बेरहमी से कत्ल कर देती है.
अगर इस गर्मी के मोसम में मैं कहूँ आप से कि आप "सूर्य" पर कविता बनाइए तो उस कविता में एक सूरज होगा, उसकी गर्मी होगी,आग होगी और धरती का अस्त व्यस्त जीवन का बनावटी दृश्य होगा  इससे ज्यादा उस कविता में कुछ ना मिलेगा...
लेकिन आपकी लेखनी जब  जज्बातों के वशीभूत होकर लिखेगी तो उस कविता में सूरज गर्म भी होगा-ठंठा भी होगा,हरियाली भी होगी,पतझड़ भी होगा, छाँव भी होगी-धुप भी होगी, जीवन अस्त-व्यस्त भी नजर आएगा-खुशहाल भी नजर आएगा, आग भी होगी लेकिन पानी का भी अहसास कराएगी,गर्मी भी होगी लेकिन शर्दी की ठिठुरन भी याद आएगी..कहने का भावार्थ यह है कि ऐसी रचना में असीमित दृश्य और भाव होते हैं.शब्द अपने आप में एक तस्वीर बनाते नजर आयेंगे जिसमें जी लगाकर रंग भरता है एक रचनाकार. 
इसका मतलब ये नहीं है कि मैं आशुकवियों के अस्तित्व को नकार रहा हूँ या हास्य कवियों को कवि नहीं मानता. ये लोग भी अपने काम में  महारत हांसिल किये हुए होते हैं.. ग़ालिब साब जिस परिस्थिति में जी रहे होते थे उस परिस्थिति पर हाथों हाथ शेर बोल देते थे... खैर 
कविता अंतरात्मा की आवाज है और ऐसे जज्बातों का केंद्र है जो किसी की आँखें छन से खोल दे या आश्चर्य में डुबो दे. 
 हो सकता है आप मेरे इस कविता सृजन के नजरिये से खफा होकर इसे निराधार बताएं लेकिन अभी तक मेरे लिए यही मेरा आधार हैं.



 -रोहित
 

8 comments:

  1. ये पढ़िए...
    आपके एक श़ेर के अल्फ़ाज़ हैं इसमें
    .....
    उसे पाने की
    कोशिश का
    चढ़ा है नशा..
    है आ रही महक
    गुलाब की
    रात देखा था
    इक ख़्वाब सा
    किया था हमने
    इज़हार प्यार का
    कर रहा हूँ इन्तेज़ार
    तेरे इकरार का
    किया है इक वादा
    वफ़ा का
    पर....
    पुरज़ोर कोशिश
    कि, मेरी मोहब्बत
    सरेआम भले ही हो
    पर तमाम न हो
    मन की उपज
    -यशोदा

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  2. जैसे कवी की कल्पना को कोई अंत नहि ऐसे ही हर किसी की सोच का ... और इंसान तो वैसे ही किसी सोच का बंदी नहि हो सकता ... विषय दे के लिखना और किसी भी स्वतः प्रेरित विषय पे लिखना ... मुझे कल्पना की उड़ान को बाधित करने वाली बात नहि लगती ...

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  3. सोच का अपना अपना नजरिया है रोहित जी आपने दिनकर (टॉपिक - कर्ण ), मैथिलीशरण गुप्त ( टॉपिक - यशोधरा ) जयशंकर प्रसाद ( टॉपिक - मनु, श्रृद्धा, इड़ा) आदि का उल्लेख किया जो स्वयं सिद्ध हैं मगर किसी भी विषय पर सृजन भी रचनाकार के कौशल पर
    निर्भर करता है । बहुत सुन्दर विचारोत्तेजक लेख ।

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  5. shwa Mohan11:31 pm, May 29, 2018
    इस चर्चा को और विस्तार देने में मेरी कोई उत्सुकता नही थी। किन्तु, आपकी टिप्पणी और आलेख को पढ़कर मैं थोड़ा कुछ और कहने के लोभ का संवरण नही कर पाया।
    पहली बात तो यह कि साहित्यिक और बौद्धिक विमर्श में सर्वदा वस्तुनिष्ठता का वरण करना चाहिए और व्यक्तिपरक वक्तव्य से परहेज़ का संस्कार सीखना चाहिए।
    दूसरी बात, विषय(टॉपिक) कहीं से भी टपके,कोई और दे,परिस्थितियों के गर्भ से प्रसवित हो, किसी इतिहास चरित्र के चित्रण के आलोक में हो,अंतर्भूत हो या बहिरभूत- यह एक मानसिक प्रक्रिया है और उसे प्रक्षालित करने वाली हहराती भाव गंगा का प्रस्फुटन अंतर्मन से होता है।सृजन के इस विराट यज्ञ की अन्तःसलिला की भाव भूमि ज्ञान से परे अनुभूत मात्र है,इसलिए शब्दों के लिए अलंघ्य और अपरिभाषेय है।
    यदि आप आदिकवि वाल्मिकी के महाकाव्य रामायण की रचना की पड़ताल, ज्ञात या कल्पित सर्वमान्य स्त्रोत जो भी उपलब्द्ध हैं के आधार पर और भले आप मानें या न मानें, करेंगे तो यही पाएंगे कि क्रोंच के वध से उत्पन्न वेदना कवि के हृदय में सृजन की भाव लहरी बनकर उमड़ी थी जरूर लेकिन उसके प्रबल रचनात्मक प्रवाह के लिए उन्हें राम कथा का 'टॉपिक' सुझाया गया। तभी उन्होंने रामायण की रचना की।
    वैसे ही, यशोधरा,उर्मिला,उर्वशी,श्रद्धा,मनु,इड़ा या अन्य 'टॉपिक' किसी न किसी परिस्थिति की पुकार थे।
    ऐसे भी अखिल भारतीय साहित्य/ कवि सम्मेलनों का हमेशा कोई न कोई 'थीम' रहा है जिस पर रचनाकारों ने अपनी अपनी विधा (कविता, निबंध,लेख,नाटक, संस्मरण आदि) में रचनायें की है।
    इसलिए रचना और सृजन कर्म के इस विराट स्वरूप को संकुचित धारणा के धागों में न बांधे। इन्हें उन्मुक्त गगन में अपनी प्रकृति और अपने स्वभाव में विचरने दे।
    अबतक के विमर्श का आभार और शुक्रिया, आदरणीय!

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  6. बहुत सही बात कही है आपने. कविता आर्डर पर नहीं लिखी जाती, कम से कम मौलिक कविता. फ़िल्मी गीतकारों की बात अलग है. वैसे एक दिलचस्प बात बताऊँ? रबीन्द्रनाथ टैगोर ने एक निबंध लिखा था - पौराणिक तथा ऐतिहासिक उपेक्षिताओं पर. उन्होंने यह इच्छा प्रकट की थी कि साहित्यकार इन उपेक्षिताओं को केन्द्रित कर इन पर रचनाएँ लिखें. गुरुदेव का निबंध पढ़कर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपने शिष्य श्री मैथिलीशरण गुप्त को उर्मिला तथा यशोधरा जैसी उपेक्षिताओं पर काव्य-ग्रन्थ की रचना करने की प्रेरणा दी और उसका परिणाम 'साकेत' महाकाव्य तथा 'यशोधरा' खंड काव्य के रूप में सामने आया.

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  7. आपका लेख बहुत अच्छा है और क्योंकि ये विचार का मंच है इसलिए अपने विचार रख रही हूँ | ये सही है कि कविता खुद उपजती है परन्तु किसी दिए विषय पर नहीं लिखा जा सकता ऐसा नहीं है | हाँ , उस समय आप को मूड बनाना पड़ता है , उस भाव को आत्मसात करना पड़ता है और फिर कलम स्वत: ही चल पड़ती है | वैसे आज तक अतुकांत कविता कुछ हद तक लेख का लघु रूप ले चुकी है | कोई शौक में लिखता है तो अपने मन मुताबिक़ लिख सकता है पर जो किसी मैगजीन, अखबार , साहित्यिक संस्था से जुड़ा है तो उसको दिए गए विषय पर मूड बनाना और लिखना ही पड़ता है चाहें वो कविता हो , लेख हो या कहानी |

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  8. लेखन में सहजता तभी आती है जब मन से लिखा जाय | यह कहकर नहीं लिखवाया जा सकता | यह बात हर विधा पर लागू होती है |

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