Saturday, 15 August 2026

प्रकृति-भेद

मेरे यहाँ का नीम 

हर जगह का नीम है,

मेरे यहाँ का मोर 

हर जगह का मोर है, 

मेरे यहाँ की नीलगाय 

हर जगह की नीलगाय है, 

ऐसे ही मेरे यहाँ का ओर बहुत कुछ भी 

हर जगह का ओर बहुत कुछ है-

हो सकता है मेरा ये दावा गलत भी हो 

मेरी इंसानी आँख और सोच 

किसी भेद तक ना पहुंची हो.

मगर इस दावे को पूर्णत: गलत न मानूं तो 

तुमसे ये कहना है-

मेरे यहाँ  किसी भी लड़की को 

तेरे नाम से पुकारने पर भी 

वह 'तू' नहीं हो जाती है 

जबकि तेरे वहाँ की लड़की 

हर जगह की लड़की होती है. 

ठीक ऐसे ही तेरे वहाँ कोई लड़का 

मैं नहीं बन पाया होगा।

इसी प्रकृति-भेद में जन्मा होगा प्रेम शायद 

इसी प्रेम के परिणाम हज़ार 

हज़ार परिणामों से जन्म लेती 

अनगिनत रचनाएँ और कविताएँ हज़ार।

मुझे भी तो लिखनी पड़ रही है एक कविता 

तुझे ये बताने के लिए कि 

मेरे यहाँ का नीम हर जगह का नीम ही होता है 

मेरे यहाँ की लड़कियां तू नहीं हो सकती। 

-ROHIT 


 

 

 

 

 

 

Friday, 14 August 2026

तपस

दूरियों में जो रेगिस्तान हो आया है 
इन्हीं तपती दूरियों में से भी  
तुम कहीं से भी निकल सकती हो,
तुम तपती रेत की लपटों के साथ या 
बरसती आँच के साथ बरसो, 
लू के साथ बहती हुई बहो. 


हवा सोच लपटों ने तेरा साथ माँगा होगा  
तपन सोच आँच ने घर से निकलते वक़्त, साथ माँगते हुए 
घर से निकलने को कहा होगा ,
लू ने माँग होगा साथ ओर लू होने के लिए.


यहाँ कहीं छाँव भी थी, जिसने भी टोक कर टोका होगा 
कि आओ तपस ! थोड़ी देर दुरी को सुस्ता लेने दो
ये आराम भी तो निकल जाने का रास्ता है. 


लेकिन तुमने तो चुन लिया होगा 
किसी के साथ कहीं न रहना,
चुनाव की इस प्रक्रिया में 
सिर्फ मेरा ही ख्याल करना    
तुम्हें कहीं न रहती हुई भी-
कहीं रह रही हो कर गया. 
काश ! तुम चुन लो 
लपट, आँच, लू या छाँव 
साथ जिनके तुम निकल सकती थी;
या निकल आती और 
मेरे यहाँ खिल उठते 
इन्सेलबर्ग, बालुका स्तूप 
या नखलिस्तान कोई.

By- रोहित