दूरियों में जो रेगिस्तान हो आया है
इन्हीं तपती दूरियों में से भी
तुम कहीं से भी निकल सकती हो,
तुम तपती रेत की लपटों के साथ या
बरसती आँच के साथ बरसो,
लू के साथ बहती हुई बहो.
हवा सोच लपटों ने तेरा साथ माँगा होगा
तपन सोच आँच ने घर से निकलते वक़्त, साथ माँगते हुए
घर से निकलने को कहा होगा ,
लू ने माँग होगा साथ ओर लू होने के लिए.
यहाँ कहीं छाँव भी थी, जिसने भी टोक कर टोका होगा
कि आओ तपस ! थोड़ी देर दुरी को सुस्ता लेने दो
ये आराम भी तो निकल जाने का रास्ता है.
लेकिन तुमने तो चुन लिया होगा
किसी के साथ कहीं न रहना,
चुनाव की इस प्रक्रिया में
सिर्फ मेरा ही ख्याल करना
तुम्हें कहीं न रहती हुई भी-
कहीं रह रही हो कर गया.
काश ! तुम चुन लो
लपट, आँच, लू या छाँव
साथ जिनके तुम निकल सकती थी;
या निकल आती और
मेरे यहाँ खिल उठते
इन्सेलबर्ग, बालुका स्तूप
या नखलिस्तान कोई.
By- रोहित
लेकिन तुमने तो चुन लिया होगा
ReplyDeleteसिर्फ मेरा ही ख्याल करना
भारतीय स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं
वंदन
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 17 अगस्त, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
ReplyDeleteलेखन जारी रहे | शुभकामनाएं |
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