Tuesday, 7 February 2012

प्यासी नजर-2

तेरी हर नजर को मैं इस कदर 
क्यूँ नजर अंदाज करता गया,

फिर तुने पेश किया हंसी का नजराना
नजराना-ऐ-हसीना मैं समझता गया

जब मैंने थोड़ी हिम्मत से नजर को साधा तुझ पर 
पाया,पहले से ही तेरी नजरों के सागर में डूबता गया

हाय रब्बा... ना समझ थी मेरी नजर
जो नजर- ऐ- हसीना को छलावा मानता गया

वो जमात वो तीर नजरों के उम्र भर चलने कहाँ थे 
जो तू बैठे सामने मैं किताबों में नजरें गडाता गया 

तेरी नजरो की चंचलता देख कर 
चेतना दिल की यूँ खोता गया

अब यादे हैं उन नजरों की इन नज़रों में 
यादों की नजरों को नजर याद आता गया

वो नजरें जब भी याद आई 'रोहित'
पछताती नजरें मेरी छलकाता गया ।
 

Friday, 13 January 2012

रफ़्तार व सफ़र

सड़क पर किसी सज्जन के
कुछ दाने बिखरे थेली से  
कौन जाने कितनी मुद्दतें हुई
कुछ पंछी थे भोले-भाले से 
न कुछ सौचा न समझा  
आ बेठे बेचारे इस सड़क पर 
अब मग्न हुए चुगने में 
बिखरे हुए दानो को 
     
    फिर अचानक.....
  एक रफ़्तार

सड़क पर अब था लहू और
बिखरे हुए पंख
न थी तो वो चंद जिंदगियाँ
अब बिखर गयी जिंदगियाँ

बच्चे रफ़्तार वालो के भी हैं
बच्चे पंछी के भी,
बच्चों को इंतजार हैं की लौट के आयेंगे 
मगर अब इंतजार में हैं फर्क बड़ा
किसी का इंतजार पल भर का
तो किसी का इंतजार उम्र भर का  

ये लालच ही तो था "रोहित"
रफ़्तार को अपने घर पहुँचने का
 और पंछी को अपना पेट भरने का |  

Thursday, 5 January 2012

पल भर का साथ


काश..!  किस्मत की लकीरें हाथों में होती
फिर इतना रिस्क मैं जरुर लेता
की हर रोज बदल डालता चाकू से इन लकीरों को
फिर देखता क्या ये बदकिस्मती भी साथ छोड़ देती हैं ?


सुनो एक कटी पतंग की जुबानी क्या कहे 
मुसीबत में पक्की डोर भी साथ छोड़ देती हैं
अब मुसीबतों से बच के निकलना चाहे तो
झोंका, शन्सनाती हवा भी साथ छोड़ देती हैं

चाहत है ऐ आसमाँ तेरी गहराई नापने की
इस चाहत में अमीरी भी साथ छोड़ देती हैं,
इस दुनियां में करोड़पति की है पहचान बड़ी
गरीबी में तो पहचान भी साथ छोड़ देती हैं,

किस्मत न हो अगर किस्मत में तो
ये दुवा-दारू भी साथ  छोड़  देती हैं
मरे हुए शव पानी पर यूँ तैरा ही करते हैं
डूबने के लिए जिन्दगी भी साथ छोड़ देती हैं,

साथ कौन देता है भला इस दुनिया में  "रोहित"
अंधेरों में तो परछाइयां भी साथ छोड़ देती हैं |

Saturday, 24 December 2011

दिल मेरा...!


विरान खंडरों की तरह पड़ा हैं दिल मेरा
आज खुबसुरत कहने आई इस खंडर को,
  
वर्षों पहले कभी मंजिल को तरसा दिल मेरा
आज तुं भी चल पड़ी अनजाने से इस सफ़र को


शीशा था कब का टुटा, पत्थर सा बना दिल मेरा
आज प्रेम जताने आई नासमझ इस पत्थर को,

कभी प्रेम फसल अपार हुई, बंजर सा बना दिल मेरा
लौट के बोने आए प्रेम के चन्द बिज इस बंजर को,

दवा थी कभी प्यार तेरा, बेअसर है अब दिल मेरा
अब तो कितने ही कौंदते चले गये इस बेअसर को,

तुं तेरी जिद्द पर अड़ी रही, जिद्दी न था दिल मेरा
जिद्दी बनना पड़ा भटके हुए इस दर-दर को,

नजरों से दूर चली जाओ तो बेहतर हैं
की दिल मिला ना मिला प्यार इस खंजर को,

माना की दरिया भी जिद्दी हैं,पर समन्दर भी कहाँ कम हैं
'रोहित' वरना कब से लगी दरिया मीठा करने समन्दर को,

(एक बेवफा की कहानी जो पहले तो एक प्रेमी को नकार चुकी है और बाद में लौट कर उसी प्रेमी के पास आती और अपना प्यार जताती है पर वो प्रेमी किस तरह से उसे उसका जवाब देता यही सब कुछ.....) 

" आप सभी को नव वर्ष की कोटि कोटि शुभकामनाएँ "

Saturday, 3 December 2011

प्यासी नज़र


मेरी नज़रों का क्या कसूर
नज़रों  से नज़र तुने जो मिलाई हैं
नजरो को मिला हैं जेसे कोई प्यार
ये नज़रों की गहराई हैं

हाय रब्बा...! इन कात्तिल नज़रों को
नजर न लगे कीसी नज़र की
अब तो आदत पड़ी हैं तेरी नज़रों की इन नज़रों को
चाहे दिल के पार हो ये धार नज़रों की

माना सब के पास हैं ऐसी नज़र
पता नही क्यों या ये बहम हैं नज़रों का
देखे किसी और को तो ये नज़र
हर किसी में वो कत्तिल नज़र नजर नही आती इन नजरों को

ये नजारा देखे हम रोज, की हर रोज मिले ये नज़र मेरी नज़रों से
'रोहित' ओर चाहिए भी क्या इन प्यार में डूबी प्यासी बेकाबू नज़रों को!


Thursday, 17 November 2011

प्रेम तस्कर

मेरे दिल में उतर कर तो देखते
ऐसा मंजर कभी देखा नहीं होगा

कभी मेरी आँखों में झांक कर तो देखते
की सपनों में भी आंसुओं का सागर देखा नहीं होगा

अगर ख्वाबों में भी चले आये होते
की ऐसा हाल-ए-तरबतर कभी देखा नहीं होगा

लोट आओ अगर तो सांसों से बढकर प्यार करूँ
की ऐसा प्रेम अपार कभी देखा नहीं होगा

तुमसे एक काम है की इस प्रेम को अमर कर दो
मिलन ऐसा दुनिया में ज्यादातर कभी देखा नहीं होगा

अगर नहीं होता है ये सुकर तुमसे तो ए दोस्त 
ऐसा प्रेम का प्यासा खंजर कभी देखा नही होगा

प्रेम पुजारी बहुत देखें होंगे आपने 'रोहित'
पर ऐसा प्रेम तस्कर कही देखा नहीं होगा |

Saturday, 12 November 2011

प्यार भरा दिखावा

पल भर की हसीं बातों से ये दिल प्यार में जलने लगा
आ जाओ ना पास पल-पल यूँ दिल जलाते हो क्यों

अपनी नजरों से बांध कर मुझे
मेरी ही नज़रों में अकेला छोड़ते हो क्यों

उसे ख्यालों,खवाबों व यादों में ही बसना था
अब मरना अच्छा है की इस तरह तड़फाते हो क्यों

दिल को पत्थर बना रखा था
फिर बातो में फूलों से झरते हो क्यों


प्यार करके अपना ही नुकसान करवाया मैने
पूछे कोई उनसे दिल के टुकड़ों को मजाक समझते हो क्यों

मेरी जिन्दगी की परवाह नही मुझे
पर मुझ जेसो को आवारा बनाते हो क्यों

दिल और आईने की फिदरत टूटते बिखरना है 'रोहित'
दोस्तों आईने से दिल को समझने में गलती करते हो क्यों |
 

Saturday, 8 October 2011

मुसाफ़िर



कभी तु मंजिल थी मेरी
अब मंजिल कोई नई ढूंढने चले हैं,

तेरी हर अदा ने किया था कायल
अब इसी अदा से नाकारा चले हैं,

गम के मारे जो मुस्कुराये थे
आज उन्ही आँखों में आंसू चले हैं

तेरे प्यार में नशा था मुझे होश न था
की ठोकर खाकर होश पाने चले हैं

नशे की लत कोई छोड़ पाया है क्या
शराबी न था की अब शराबी बनने चले हैं,

प्यार किया था क्यूँ
अब अपने आप को कोसने चले हैं

सोचता हूँ तुझे भूलना अच्छा हैं
अब तो कोई नई शुरुवात करने चले हैं,

एक तरफ़ा प्यार से नफ़रत हो गयी
अब प्यार से प्यार करने चले हैं,

जिन्दगी के खेल भी अजीबों गरीब है
हम कभी सफ़र तो कभी हमसफ़र ढुंढने चले हैं,

राही बनकर रह जाती हैं दुनियां 'रोहित'
मुसाफिर वही जो सच्ची मंजिल ढुंढने चले हैं |

Thursday, 6 October 2011

अपनी शिक्षा पद्धति




बड़ी मुश्किलों से एक बच्चा पढ़ना होता था
सब बड़े छोटों को खेतो में काम करना होता था,

पढ़ने वालों में मेरा नाम शामिल था
सब भाई बहिनों में मैं पढ़ने वाला होता था,

न पोशाक थी न पैसा था
वही था जो कुछ खेतो में होता था,

न किताब थी न पेन था हाथ से बनाई कलम थी
फिर तख्ती पर सुलेख लिखना होता था,

दवात क्या थी, चारआन्ने पुड़िया थी
हाथों से घोल बनाना होता था,

पढने वाले की यही निशानी थी
कहीं दवात हाथ पर लगी कहीं कुर्ता कला होता था,

तख्ती साफ करने को न सफेदा था न रबड़ था
बस मुल्तानी मिट्टी संग पानी होता था,

हर परीक्षा में मैं बस उतीर्ण हुआ
न अंकों का कोई खेल था न प्रतिशत मालूम  होता था,

आज दूसरी कक्षा का भी बच्चा कुली बना है  
जेसे बरसों पहले बंदुवा श्रमिक होता था,

बच्चों पर शारीरिक व मानसिक बोझ बडा है
किताबों का व अंकों का; ऐसा तो न होता था,

महंगाई की जंजीरों में शिक्षा बनी व्यवसाय है 
पहले शिक्षा पर इतना खर्चा न होता था,

दुर्लब शिक्षा से कामयाबी कोसों दूर हुई 
सरल व सहज शिक्षा से हर एक कामयाब होता था

आज कहाँ है वो तख्ती दवात और कलम 'रोहित'
कभी पढ़ना व पढ़ाना इन्ही से तो होता था |

(धोलपालिया गाँव की १९७२ से पहले की शिक्षा पद्धति 
जेसा की मेरे पिताजी ने मुझे बताया )

Sunday, 2 October 2011

शिक्षा- शिक्षक के बारे में

आज की तरह नही थे शिक्षक,
शिक्षक नही गुरुदेवों का ज़माना था,

दीपावली के बाद शर्दियों के दिन थे
शाम को गुरु जी का स्कूल में बुलाना था,

शाम का भोजन करने के बाद
लौट के स्कूल को आना था

वह पहली शाम थी स्कूल की
खटिया बिस्तर साथ लाना था,

तब बिजली नही थी गाँव में
एक बड़ा सा लंप जलना था

रोज़ गाँव की बालू रेत से
लंप का शीसा साफ करना था,

तिन ओर हम बैठे थे और एक ओर थे गुरु जी
बिच में एक बड़ा सा लंप जलाना था,

हम पढ़ते थे बड़ी राग से
वो गुरु जी का नोवेल पढना था

देर रात तक पढ़ते थे
फिर वही पर सोना था,

सुबह गुरु जी ने आवाज लगाई
सबको एक साथ जगना था,

घर भोजन करने के बाद
फिर लौट के स्कूल आना था,

स्कूल में किताबी ज्ञान ही नहीं
व्यावहारिक ज्ञान भी मिलता था,

तिन बजे से गोधूली तक
समय खेल-कूद का होता था,

आज न रही वो पढ़ाई न रहे वो गुरु जी
कभी स्कूल भी गुरुकुल होता था,

आज ट्युशन व पैसे पर मरता शिक्षक हैं 'रोहित'
कभी सच्चा ज्ञान देना उनका मक्सद होता था |

(१९७२ हमारे गाँव धोलपालिया की शिक्षा पद्धति 
और एक चोथी कक्षा का विवरण )