Friday, 14 August 2026

तपस

दूरियों में जो रेगिस्तान हो आया है 
इन्हीं तपती दूरियों में से भी  
तुम कहीं से भी निकल सकती हो,
तुम तपती रेत की लपटों के साथ या 
बरसती आँच के साथ बरसो, 
लू के साथ बहती हुई बहो. 


हवा सोच लपटों ने तेरा साथ माँगा होगा  
तपन सोच आँच ने घर से निकलते वक़्त, साथ माँगते हुए 
घर से निकलने को कहा होगा ,
लू ने माँग होगा साथ ओर लू होने के लिए.


यहाँ कहीं छाँव भी थी, जिसने भी टोक कर टोका होगा 
कि आओ तपस ! थोड़ी देर दुरी को सुस्ता लेने दो
ये आराम भी तो निकल जाने का रास्ता है. 


लेकिन तुमने तो चुन लिया होगा 
किसी के साथ कहीं न रहना,
चुनाव की इस प्रक्रिया में 
सिर्फ मेरा ही ख्याल करना    
तुम्हें कहीं न रहती हुई भी-
कहीं रह रही हो कर गया. 
काश ! तुमने चुन लो 
लपट, आँच, लू या छाँव 
साथ इनके तुम निकल सकती थी;
या निकल आती और 
मेरे यहाँ खिल उठते 
इन्सेलबर्ग, बालुका स्तूप 
या नखलिस्तान कोई.

By- रोहित  

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