मेरे यहाँ का नीम
हर जगह का नीम है,
मेरे यहाँ का मोर
हर जगह का मोर है,
मेरे यहाँ की नीलगाय
हर जगह की नीलगाय है,
ऐसे ही मेरे यहाँ का ओर बहुत कुछ भी
हर जगह का ओर बहुत कुछ है-हो सकता है मेरा ये दावा गलत भी हो
मेरी इंसानी आँख और सोच
किसी भेद तक ना पहुंची हो.
मगर इस दावे को पूर्णत: गलत न मानूं तो
तुमसे ये कहना है-
मेरे यहाँ किसी भी लड़की को
तेरे नाम से पुकारने पर भी
वह 'तू' नहीं हो जाती है
जबकि तेरे वहाँ की लड़की
हर जगह की लड़की होती है.
ठीक ऐसे ही तेरे वहाँ कोई लड़का
मैं नहीं बन पाया होगा।
इसी प्रकृति-भेद में जन्मा होगा प्रेम शायद
इसी प्रेम के परिणाम हज़ार
हज़ार परिणामों से जन्म लेती
अनगिनत रचनाएँ और कविताएँ हज़ार।
मुझे भी तो लिखनी पड़ रही है एक कविता
तुझे ये बताने के लिए कि
मेरे यहाँ का नीम हर जगह का नीम ही होता है
मेरे यहाँ की लड़कियां तू नहीं हो सकती।
-ROHIT




