Saturday, 15 August 2026

प्रकृति-भेद

मेरे यहाँ का नीम 

हर जगह का नीम है,

मेरे यहाँ का मोर 

हर जगह का मोर है, 

मेरे यहाँ की नीलगाय 

हर जगह की नीलगाय है, 

ऐसे ही मेरे यहाँ का ओर बहुत कुछ भी 

हर जगह का ओर बहुत कुछ है-

हो सकता है मेरा ये दावा गलत भी हो 

मेरी इंसानी आँख और सोच 

किसी भेद तक ना पहुंची हो.

मगर इस दावे को पूर्णत: गलत न मानूं तो 

तुमसे ये कहना है-

मेरे यहाँ  किसी भी लड़की को 

तेरे नाम से पुकारने पर भी 

वह 'तू' नहीं हो जाती है 

जबकि तेरे वहाँ की लड़की 

हर जगह की लड़की होती है. 

ठीक ऐसे ही तेरे वहाँ कोई लड़का 

मैं नहीं बन पाया होगा।

इसी प्रकृति-भेद में जन्मा होगा प्रेम शायद 

इसी प्रेम के परिणाम हज़ार 

हज़ार परिणामों से जन्म लेती 

अनगिनत रचनाएँ और कविताएँ हज़ार।

मुझे भी तो लिखनी पड़ रही है एक कविता 

तुझे ये बताने के लिए कि 

मेरे यहाँ का नीम हर जगह का नीम ही होता है 

मेरे यहाँ की लड़कियां तू नहीं हो सकती। 

-ROHIT 


 

 

 

 

 

 

Friday, 14 August 2026

तपस

दूरियों में जो रेगिस्तान हो आया है 
इन्हीं तपती दूरियों में से भी  
तुम कहीं से भी निकल सकती हो,
तुम तपती रेत की लपटों के साथ या 
बरसती आँच के साथ बरसो, 
लू के साथ बहती हुई बहो. 


हवा सोच लपटों ने तेरा साथ माँगा होगा  
तपन सोच आँच ने घर से निकलते वक़्त, साथ माँगते हुए 
घर से निकलने को कहा होगा ,
लू ने माँग होगा साथ ओर लू होने के लिए.


यहाँ कहीं छाँव भी थी, जिसने भी टोक कर टोका होगा 
कि आओ तपस ! थोड़ी देर दुरी को सुस्ता लेने दो
ये आराम भी तो निकल जाने का रास्ता है. 


लेकिन तुमने तो चुन लिया होगा 
किसी के साथ कहीं न रहना,
चुनाव की इस प्रक्रिया में 
सिर्फ मेरा ही ख्याल करना    
तुम्हें कहीं न रहती हुई भी-
कहीं रह रही हो कर गया. 
काश ! तुम चुन लो 
लपट, आँच, लू या छाँव 
साथ जिनके तुम निकल सकती थी;
या निकल आती और 
मेरे यहाँ खिल उठते 
इन्सेलबर्ग, बालुका स्तूप 
या नखलिस्तान कोई.

By- रोहित  

Wednesday, 21 February 2024

तुम हो तो हूँ

तेरे बाद 
ये शांत पते यूँ ही आँधियों में फड़फड़ाते रहेंगे 
तेरे बाद 
ये शांत नदी बरसात के दिनों यूँ ही शोर मचाती रहेगी 
तेरे बाद 
किसी कच्चे रस्ते की धूल सफ़ेद पोशाकों पर पड़ती रहेगी 

तेरे बाद 
गाँव के नुक्क्ड़ों पर ताश की बाजियां 
चार लोगों की हथाइयाँ 
भूख मारने को भिनभिनाते लोग
गिले-शिकवों में यूँ ही बसती रहेगी बेबसी  
कुछ भी तो न ठहरेगा 

मैं शांति के इस उद्धण्ड स्वभाव को कोसता हुआ 
नदी के किनारे से उठ कर 
मिटटी से सनी सफ़ेद पोशाक पहने 
कच्चे रस्ते पर चल दूंगा 
समाज के सारे दायरे तोड़ दूंगा 
तेरे बाद...  
                                     By- Rohit

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Sunday, 3 September 2023

संस्कृति - विकृति

मौन के बाद भी जो मौन रहे 
परिवर्तन, मद, अभिमान और  गुमान की 
उथल-पुथल के बाद भी 
शेष रह जाए वो मौन; है संस्कृति 
गर जाग उठा है संस्कृति-रक्षा का भाव
देख किसी का मात्र ढब - मज़हब अलग   
हो गए हों एक मनुज के खिलाफ़ 
उसके धर्म, रंगो-रूप के ख़िलाफ़  
या हों बंदगी, तौर-तरीकों के खिलाफ़ 
या आई हो आपकी बातों में नफ़रत अलग 
तो ये देश की संस्कृति नहीं, 
जानो, है आपकी अपनी विकृति- 
जो युगों से है ठोस बहुत 
नफ़रत-अपराध के अलवा कुछ सकी समेट नहीं.  

और आप हैं एक तुच्छ
आपका अंश तक रहेगा शेष नहीं 
आप के लिए संस्कृति का अथाह मौन रहेगा अछूत.
देश की संस्कृति ने तो स्वीकार किए हैं 
प्रत्येक नागरिक के कर्मों, धर्मों 
रंगों, बंदगी और तौर-तरीकों को 
यहाँ तक कि कुछ स्वार्थों को.

लेकिन जब आपकी बातों से- 
बलात चुपी के बाद जहनों में जहर रहे भरे 
देश का कोई हिस्सा हिंसक बना रहे
नागरिकों का हिंसा के बाद हिंसक बना रहना  
अक्ल का अँधा बना रहना 
क्रांति के बाद क्रांति को आतुर रहना, 
विकृति है, संस्कृति नहीं.  
संस्कृति - विकृति में 
अंतर मिटा देना अपराध है 
मौन के बाद भी मौन शेष रहे 
वही शांत, तरल, व्याप्त व्यापक 
देश  की संस्कृति है. 

- By 
रोहित 

Thursday, 13 July 2023

अभी तक

मैं उजले दिन में चलने का अभ्यस्त  
उस शिखर दोपहर को ऐसा पहली बार देखा
न अँधेरा हुआ न ही धुप रही  
जिस दोपहर उस तपते चौराहे पर 
हमने आधा एक घंटे में तमाम बातों को याद किया 
बिताये हुए पलों की बातें गर्म भाँप की तरह 
तन-मन को जलाती रही 
हमने मिलते रहने की झूठी कसमें न खाई  
दोनों से अलविदा कहने का अभिनय भी न हुआ 
तुम बस चली गयी.... नाक की सीध में 
तुमने आम आशिक की तरह मुड़कर नहीं देखा 
लेकिन मैं ओझल होने तक तकता रहा तुम्हें  
चौराहे की चारों राहों पर दौड़कर, घूम-घुमाकर  
तुमसे एक बार फिर से मिलने की 
अमर तमन्ना मन में लिए अब मैं  
उस शहर को जिसने हमें मिलवाया 
उस चौराहे को जहाँ हम अंतिम रूप से मिले 
नाक की सीध वाली सड़क को जो जिंदगी की दरिया का अंतिम चित्र बन गई 
उस उजले दिन को जो कभी न ढलेगा और न उदय होगा 
- कह न सका "अच्छा तो मैं चलता हूँ" 
इस बीच की स्थिति में अजर हो जाना 
हकीकत में नहीं होना और 
कफ़नों में लिपटी छोटी छोटी उम्मीदों का भार तक दूरियों में बँट जाना   
जीना-मरना भी ना होना 
अकेले बीच में ठहर जाना
रोज खालीपन के द्वारा ही निचोड़ा जाना                                                                           
गोखरू पर चलने जैसा दुःख दायक है।   
कहने को तो मैं चला भी आया हूँ 
यहाँ तुम से बहुत दूर 
लेकिन ये मेरा अंतिम रूप नहीं है,  
हारे हुए आशिक की तरह 
उन सब से अभी तक कह नहीं हुआ 
"अच्छा तो मैं चलता हूँ।"

                                                     




Saturday, 25 December 2021

मगर...



मैंने चाहा  
एक साथ 
एक घर 
ढेरों बातें 
और उसकी बाँहों में सिमट जाना 
मगर... चलो कोई बात नहीं 

मैंने चाही 
पहली सी मुहब्बत 
महीने में कुछ ही बातें 
मुलाकातें ना ही सही 
मगर... चलो कोई बात नहीं 

मैंने चाहा 
वार-त्योहार पर कम से कम 
हाल चाल से वाकिफ़ होना 
दीदार ना ही सही 
मगर... चलो कोई बात नहीं 

आख़िर मैंने चाहना कम किया 
वो कहती भी रही कम का 
मगर कम भी तो कितना कम होता 
अब कम क्या विलुप्त का पर्याय होगा 
मगर.... चलो कोई बात नहीं 

मुहब्बत जाया ही सही 
नजदीकियाँ बदसूरत ही सही
कोंपल का फूटना ही सही 
मगर... चलो कोई बात नहीं।  

-Rohit
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Tuesday, 9 March 2021

अर्थों के अनर्थों में

हमें भुलवा दिया जाता है
अर्थों के अनर्थों में क्या छुपा है
एक दिन की महिमा के अर्थ से 
364 दिनों के अनर्थों का क्या हुआ?
या सुना दिया जाता है अनर्थों के अर्थ को निथार के
अनर्थों के लाभ को कोई जान न ले 
इसलिए अर्थों की सीमा के बाहर की दुनियां नष्ट कर दी गई
ये घाव न नासूर बनता है न भरता है।
विडंबना के घाव को कुरेदते वक्त
खून नहीं पानी निकलता है
क्योंकि इस चूल्हे में जलने वाली आग,
राख तक के निशाँ गहरे दबा दिए गए।

प्रकृति में समाज निर्माता आदमी ने
समाज में प्रकृति की कोई व्यस्था न की
इसने खुद के सिवाय सभी को मृत चमड़ी माना
वो भूल गया ईडन गार्डन से साथ में निकली औरत को।
वहां से आज तक के सफ़र में
कौनसी मानसिकता का संकीर्ण मोड़ आया
जो आपको इतना आगे पीछे होना पड़ा,
किस बात का भय था और किसको था
जो बराबर की हस्ती तेरी मुठ्ठी में आ गयी।

वो सब कुछ बन गयी तेरे लिए-
तेरे लिए क्यों बनी वो?
सागर भी, झील भी
बहती नदी भी, मोरनी भी
फूल भी, सावन की सुहावनी बूंद भी
मगर औरत औरत न बन पाई
वो पर्दे में क्यों आ गयी
क्यों जिस्म छुपाना केवल इसे ही जरूरी हो गया
हमें भुलवा दिया जाता है
अर्थों के अनर्थों में क्या छुपा है।
  By- ROHIT

Thursday, 4 March 2021

गुजरे वक़्त में से...

हम कितनी तेज़ी से गुजरे 
उस गुजरे वक़्त में से
बगैर मुलाकात किये इज़हार तक पहुंच गए
नतीजन विफलता तक पहुंच गए
कितनी चीजें हाथ में से निकल गयी
तेरा साया तक छूने से जो खुशियां थी; फिसल गई,
बालों की चांदी तक निकल गयी
हमारे ख़र्च होते हर एक लम्हा ख़्वाब बने
एक सिगरेट उंगलियों में फंसी रह गयी।
जिसे उंगलियों में रखनी चाही वो क़लम
और कश्मकश बयाँ  न कर सकने वाले अल्फ़ाज़ से भरा मैं
बस निब है जो टूटती रहती है
क़लम है जो झगड़ती रहती है।

आसमाँ की जगह सागर देखा
सागर की जगह आसमाँ देखा
मैंने तैर कर चांद पर पहुंचना चाहा
और तड़फ ये कि तारों पर ही ठहर गए
तमाम उम्र हक़ीक़त ने परेशान न किया
ख़्वाबों ने लूट लिया
ख़्वाब जो तेरा था ज़िंदगी बन गया
ज़िंदगी जो मेरी थी  ख़्वाब बन गया।
हम बस उसी तरह से गुजर जाएंगे
एक ही तो रस्ता है वहीं से निकल जाएंगे।
                -ROHIT


Friday, 1 January 2021

समानता २

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मुझे रिवाजों का हवाला ना दें 
मुझे अंधेरों वाली मशालें ना दें 
एक जुर्म जिसे दुनिया का हर एक 
आदमी रिवाजों के हवाले से करता हो- तो 
मैं पूछता हूँ क्या वो जुर्म; जुर्म नहीं रहता 
मैं कहता हूँ विवाह एक जुर्म है 
इस जुर्म की सज़ा क्यूँ नहीं 
हर बार डोली में चहकती-चीखती चिड़िया ही क्यों?
बेटी को बाप से अलग करना जुर्म है 
माँ के घर बेटी का मेहमां हो जाना जुर्म है 
घर को उसका अपना घर न होने देना जुर्म है 
जबरदस्ती का अन्यत्र समायोजन जुर्म है 
पली बडी लडकी पर अधिकार करना 
घिनोना ही नहीं जुर्म है

तो फिर दुनियां कैसे बढ़ेगी?
सवाल का जवाब रिवाजों के हवाले से क्यों सोचें 
सोचें कि प्रजनन और प्यार दोनों अलग विषय हैं 
हर बार के विवाह में प्यार की सुविधा नहीं 
हर बार के विवाह में प्रजनन की सुविधा है
आप अपनी पशुता को पशुता क्यों नहीं मानते  
मैं पूछता हूँ ये जुर्म नहीं तो क्या है? 

पूछना चाहोगे कि विवाह की रस्म कैसे हो?
मैं कहता हूँ मानसिक तैयारी जरूरी है
ये जो जुर्म है उसे कबूल करना जरूरी है 
रस्मो-रिवाज में घुन लग गये ये मानना जरूरी है  
सवाल-जवाब के खातिर आमने-सामने होना जरूरी है
अइयो मिलने मैं मिल जाऊंगा जिंदगी में से जहर फांकते हुए 
अंधेरों में तीर चलाते हुए 
मुझे रिवाजों का हवाला ना दें 
मुझे अंधेरों वाली मशालें ना दें. 

-ROHIT
 






 

Sunday, 13 December 2020

समानता

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मैं तुम्हें देख रहा हूँ
मेरे साथ पढ़ती हुई
और साथ में ही देखता हूं 
तेरे माथे पर बिंदी
छिदवाए नाक में नथ
छिदवाए कान में बालियां
गले में फसाई गयी सांकली
हाथों में पहनी चूड़ियां 
पैरों में अटकाई गयी पायजेब
तब दुध में खटाई की तरह गिरती है ये सोच 
कि क्या ये सब शृंगार ही है??
और तुम पढ़ती जाती हो मेरे साथ
चुप चाप बेमतलब सी।
तुमने मेरी मानसिकता के हिसाब से 
अपनी आजादी को गले लगाया है 
मैंने भी तेरी गुलामी का तुझे अहसास ना हो 
बेहोश करने वाला एक जरिया निकाला है 
"तुम सोलह शृंगार में कितनी खूबसूरत लगती हो"
और तेरा कद तेरे मन में मेरे बराबर हो जाता है।   

-Rohitas Ghorela 

Sunday, 20 September 2020

आत्मनिर्भता


सरकार; आप समझते हो उतना आसान तो नहीं                    
काम से बे-काम होकर आत्मनिर्भर होना आसाँ तो नहीं  
हम आदमीयों का सिर्फ आत्मनिर्भर होना
पेट में धंस रही आँतड़ियों को ओर अंदर तक धकेलना हो सकता है
आत्मनिर्भरता यानी आलोचनाओं का मर जाना हो सकता है
आलोचनाओं का मरना यानी 
लोकार्पण के समय अवसाद से भर जाना हो सकता है
जब अवसाद एकांत का परिणाम है
तो हमें किस दिशा की ओर बढ़ना है, सरकार?
किसी का साथ छोड़ देने से आत्मनिर्भता नहीं आती
सभी का साथ ही इसकी प्रयोगशाला है
सरकारें अपने मुद्दे 
आत्मनिर्भरता की मुर्दा
खिड़की पर लगे कफ़न जैसे पर्दे से ढंक दे
हम नागरिक जो कुछ काम के थे
बेक़ाम होकर -
हमारा पसीना जो त्वचा के गहरे में नमक बन चुका है
इसी कफ़न से पोंछने का अभिनय करेंगे
अभी हमें मात्र चहरे से खुश रहना सिखाया जाए
अभी हम चहरे से और मन से एक हैं
ये आप के लिए खतरा है।
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Tuesday, 7 April 2020

एक भी दुकां नहीं थोड़े से कर्जे के लिए


जनाबे जॉन एलिया साब की एक गज़ल आज के इस दौर पर कितनी सटीक बैठती है आप ही देख लीजिये इस गजल के चंद शेर-

ऐश-ए-उम्मीद   ही   से   ख़तरा   है
दिल  को  अब  दिल-ही  से  ख़तरा  है

जिस के   आग़ोश   का   हूँ   दीवाना
उस के   आग़ोश   ही   से   ख़तरा   है

है  अजब  कुछ  मोआ'मला  दरपेश
अक़्ल  को   आग ही   से  ख़तरा  है
  
शहर-ए-ग़द्दार  जान  ले  कि  तुझे
एक   अमरोहवी   से   ख़तरा   है

आसमानों  में   है   ख़ुदा   तन्हा
और  हर  आदमी  से   ख़तरा   है

अब  नहीं  कोई   बात   ख़तरे  की
अब सभी  को  सभी  से  ख़तरा  है




कोरोना जैसी महामारी के बारे में अब तक आपने खूब पढ़ लिया होगा और खूब ही जान लिया होगा। इस वक्त तक जब मैं ये लिख रहा हूँ; भारत में 4908 मामले और 137 मौते हो चुकी है।  इसमें कोई संदेह नहीं की बहुत सारे लोग ठीक भी हुए हैं; अब तक भारत में 382 लोग रिकवरी कर चुके हैं।  लेकिन इसके रोकथाम के सन्दर्भ में जाने-अनजाने में हमसे बहुत बड़ी गलतियां हो रही है। और ये गलतियां मैंने अपने अनुभव से जाना है। ये वो गलतियां है जो हर कहीं लिखी या सुनाई नहीं जा रही है।  गलतियाँ जो आमतौर पर हम कर रहे हैं वो ये कि--
1. रुमाल और मास्क में मास्क को ही चुने- बहुत से लोग मास्क की बजाय रुमाल बाँध लेते हैं। ये सही है कि रूमाल मास्क जैसा काम करती है लेकिन हम वही रुमाल हमारे कमरे तक ले जाते हैं, वही रुमाल बिस्तर पर डाल देते हैं, बहार से आते ही हम हाथ तो धो लेते है लेकिन उसी रुमाल से हाथ पूंछ लेते हैं।  बहुत से लोग वही रुमाल अपनी माँ या पत्नी से धुलाते हैं जिससे खतरा बढ़ जाता है।
2. हजामत ना करवाएं- वैसे तो सैलून या ब्यूटी पार्लर जैसी दुकाने बंद हैं लेकिन फिर भी नाई  (जाती सूचक शब्द ना समझा जावे)  का काम करने वाले घरों में जा-जा कर काम कर रहे हैं।  ऐसे काम करने वाले व्यक्ति सबसे ज्यादा संक्रमित हो सकते हैं क्यूंकि ये एक ऐसा काम है जिसे दूरी बनाकर नहीं किया जा सकता। इसलिए इनसे काम ना करवाएं ये आप और आपके नाई की सुरक्षा के लिए बेहतर होगा।  दाड़ी या केश बढा लो कुछ दिन- हो सकता है ये आपके रूप को ओर बेहतर बना दे।
3. गम्भीरता से लेने की जरूरत- सुरक्षा ही इलाज़ है, लॉकडाउन का सख्ती से पालन करें (हमें आने वाले 2 महीनों तक इसी लॉकडाउन की बहुत सख्त जरूरत है)  बहादुरी दिखाने की जरूरत नहीं है। जो भी लॉकडाउन का पालन नहीं करता है वो देशद्रोही ही नहीं वरन सम्पूर्ण वैश्विक सभ्यताद्रोही है। खुद को घर के कामों में, रसोईघर में, गार्डनिंग में या मनोरंजन में व्यस्त रखें। एक डॉक्टर के अंदाजे के मुताबिक भारत में यह आगे आने वाले अप्रेल-मई के दिनों में 1.5- 2 लाख लोगों को प्रभावित कर सकती है।
घबराएँ नहीं ये खुद को खुद तक ले जाने का सही समय है।

आइये अब ले चलता हूँ साहित्यिक रसपान यानि मेरी नई रचना की तरफ़-

एक भी दुकां नहीं थोड़े से कर्जे के लिए 


गलियाँ   जो   बनी   थी   सूनी  रहने    के    लिए
क्योंकर   किया   आबाद   एक   दफ़े   के    लिए

तुम तो क्या, कोई भी तो किसी का सानी नहीं है
खींचा दम तैयार है मगर दूर तक  जाने के  लिए

ए   मेरी  ज़िंदगी   की   आबो-हवा  पास  तो  आ
अब  तो  एक  ही  साँस   है  बाकी मरने के  लिए

तू  उस  कफ़स  से   छुटा   कर   आ   सकती है
मैं  भी  बैताब  हूँ  मेरे  कफ़स  में  लाने के लिए

नज़र   ही   क्या   बुरी  होती  हम  पर   उनकी
एक    सांस   ही   काफ़ी   है   मारने   के  लिए

बे-रूहों   में,   है    किस   बख़्त    की   बेवफ़ाई?
तुम   ना   मिलते   सिर्फ़     मिलने    के   लिए

अंदर शोर  मचाया गले  मिलने  को  किसी  ने
गला हद्द तक उतर  आया  बन्द  होने  के लिए

हर दुकाँ बन्द है आँखों  की  तरह  नशेबाज की
क्या एक भी दुकाँ नही थोड़े  से  कर्ज़े   के  लिए


- Rohit

Tuesday, 17 March 2020

सर्वोपरि?


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युद्धभूमि में
लौहे के पैने अँगारों की वर्षा में
मैं जब कोहनियों के बल
सुन पड़ी टांग को घसीटता हुआ
जेब में भरी वतन की मिट्टी के संग
पत्थर की ओट में आ गया हूँ
कराहने को दबाकर
घुटने के नीचे लगी दो गोलियों वाला पैर टनटोलते वक्त
देश प्रेम के भाषण या
वतन की रक्षा का वचन
याद नहीं आते,
और उस मिट्टी को नहीं चूमता
जिसमें बारूद और लहू की मिलावट से अजीब गंध है।
मुझे याद आती है वो
बैचेन और बेसुध सी शक़्ल
जो मुझे जंग में भेजना नहीं चाहती
जो मुझे जंग में सोच कर सिहर जाती है
जिससे अलविदा कहते नहीं बना
वो जो मेरे चिथड़े देख कर आजीवन खुद को कोसेगी।

मैं जो यहां हूँ
देख रहा हूँ
उस पार खेमे वाला
भयभीत और खुशी का मिश्रण है-
शुक्रगुज़ार है कि उसके गोश्त में गोली अभी धँसी नहीं,
यहां जिंदगी के अलावा
किसी को ऐसी मातृभूमि नहीं चाहिए।
पक्ष या विपक्ष दोनों ओर
युद्ध में धकेलने जैसी बाध्यता हटा दी जाएं तो-
मैदानों में जिंदगी खेलती
स्वदेश ही सर्वोपरि होता
अपनी अपनी अंदरूनी आपदा से रक्षा होती।

मैं जो यहां हूँ
चाहता हूं
प्रेम की संधि करना
जिसे युद्ध से निकाल के
वतन के हृदय में धँसा दूँ
बस कि वतन में वतनी जहन पैदा हो
बस कि आइंदा से लहू में घुसे
लौहे को सोने का तगमा ना मिले।
-रोहित

Sunday, 8 March 2020

कविता २

'उम्मीद बाकी है हम में ही' 


















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एक वक्त था जब
महकते थे फूल बहुत
ऋतुएं आबाद होती थी
लय की बात होती थी
संगीत झरते थे अल्फ़ाज़ डूबते थे
हीर रांझे सा इश्क़ पिरोये
मैं नाचती थी कि मेरी एड़ियों की थाप से
कागज़ फट जाया करता था
ऐसी बिछड़न थी समाई कि
गीले पन्ने हाथ की छुअन से चिपकते थे
स्याही फैलने तक मेरे वजूद का अहसास था
एक वक़्त था जब-
पगडंडी, रास्ता, खेत, बगीचे, गांव-शहर
सब का सौंदर्य गले तक भरा रहता था 
मेरे अंदर के ज्ञान, वाणी, धर्म या दर्शन ने
आदमी को आदमी बनने की सहूलियत दी है-
मैं मगर अब भी बीसियों हज़ार साल बाद भी
मेरे जन्मदाता के
उन्हीं समांतर विचारों से बैचेन हूँ
दोहराव का मतलब है
जन्म और जन्म के बाद फिर जन्म
ये क्रिया न मरण है ना ही जिंदगी
मात्र अल्फ़ाज़ के हेर फेर से बेदम हूँ
लय या संगीत जैसी मिलावट से ऊब चुकी हूँ।

हे मेरे जन्मदाता!
तुम अगर नींव ही बनाते रहोगे
तो ये कोरी बर्बादी है और मेरे क़त्ल में सहयोग
मैं नहीं कहती की मेरी नींव में लगे
हर एक विचार, अल्फाज, लय या दर्शन
अब काम के नहीं रहे
बल्कि इनको काम में लेने के बाद जो बचता है
उस मकां की ईंट धरी न गयी।
नींव में जो परिश्रम लगा है
वो आज एक सुविधा है-
कि कुछ बातें मान ली जा सकती है
कि वो पहले से सिद्ध हैं और प्रमाणिक है।
उनको कुरेदना छोड़, नया बुनना सीखो
मुझ में नए प्राण फूंको
मुझे आधुनिकता की गंद चाहिए
मुझे वास्तविकता से अवगत होना है
मैं कमजोर नहीं कि जान के रो दूंगी
मुझे पत्थरबाज़ी में उतारो
मैंने खूब मय पी है
मुझे कुरूपता से प्यार है
अब मुझे वो आंगन चाहिए
जहां से सुंदरता की अर्थी विदा की जा सके
और मातम को चूमा जा सके
अपने कटे होठों वाले मुँह से
कौमी एकता को प्यार का बोसा दूँ
ताकि इसमें अपने दांत गढ़ा सकूं।
मुझे इतिहास नहीं आज का कांच बनाओ
मुझसे ताजा दर्द को जोड़ो
मेरी बुनियाद को जाल का तगमा ना दें
कविवर! खुद को फंसी चिड़ियाँ न माने।
     
                         BY
          ROHITAS GHORELA

लिंक- कविता 


       


Friday, 14 February 2020

प्रार्थना

माना मैंने हर बात को क्रूर
बेढंग करके परोसा है
उसी कलम को विनती पर भी भरोसा है
ये कुछ ऐसा है जो समझ में आये
ये कुछ ऐसा है जो जहन में बसे
एक पक्षीय लिखने से पहले आपको सोचना पड़े-
कुछ ऐसा है क्यूंकि
हमारे मौसमों या ऋतुओं को
खेमों में बंट जाना पड़ता है
जिस किसी ने हर मौसम के अनुसार
अपना इंतजाम पुख्ता किया है
प्रार्थना है कि वो मौसम की खूबसूरती
का जिक्र अपनी बातों में ना छेड़े 
अलाव के साथ बैठकर
जो मजे से कह रहा था ठंड कड़ाके की है
कड़ाके शब्द को उसने नहीं जिया। 
जो नये साल पर कणकों में
आधी रात को पानी देता है
जिसके पैर जनवरी से जम गये हों
कस्सी की मार से पानी की बोछारें जब चहरे पर पडती है
और कभी क्यारी से टूटे पानी को रोकने के लिए
चादर की बुकल खोल देनी पडती है
तब होता है जनवरी व जिस्म का टकराव
और जिस्म की चटकनों की आवाज खेतों में गूंजती है
ऐसे आदमी को नहीं पता बार या कॉफ़ी हॉउसों में
बड़ी सी घड़ी में बीतने वाले साल के
आखिरी दस सेकंड का काम डाउन शुरू हो गया है
लोग साथ साथ में उलटी गिनती गिन रहे हैं
व शैम्पेन या व्हिस्की की बोछारें उछाली जाएगी
रंग बिरंगी रौशनी कोहरे में दब जाएगी
पटाखों की आवाज ठंडी रात को दहला देगी।
वो तो जमीन में खुदे चूल्हे पर चाय बनाएगा
दुआ करेगा
कि फसलों को पाला न मार जाये
उसकों नहीं मतलब कि बसंती फुल पीले होते हैं
वो ये जानने में व्यस्त है
कि सरसों की फलियों में दाना बना है या नहीं।

आप एयर कंडीशनर में बैठ कर अपने भाषणों में
इनकी मेहनत को 'मेहनत' नाम ना दें
जब तक कि आप को इसके असली मायने ना पता हो
खौलते कीचड़ में खाद देना
व तेज तपस में जब सब कोयला होने को हो
उसी में सफ़ेद बासमती कैसे पकता है
इसका आपको मात्र बातूनी ज्ञान है।

सावन की बरसातें बदन ठंडा करती हैं
जिस्मों को गिला करती है
मन में झूले पड़ते होंगे
लेकिन जब बरसातें रुके नहीं
तब कपासी फव्वों का जिस्म काले पड़ जाते है
और मेहनत पिंघलने लगती है
पेड़ों पर अंतकारी झूले पड़ते हैं
जिनकी सुर्खियां
चाय की चुस्कियों के साथ बासी हो जाती है

ये लोग मिलावट नहीं चाहते
जब उदासियाँ पनपती है तो भी
आपके साथ खिलखिलाते हैं
आपको चाहिए कि इन नकली हंसी को पहचाने
और मौन रहें
ताकि हौले से ये अपने मर्म को उजागर कर सकें
प्रार्थना है मौसम की खूबसूरती का कलमी बखान न करें
मौसमों को खेमों में ना बांटे,
अब हमें जरूरत है दूसरा व जमीनी रूप  जियें।
                               
               - रोहित 


Friday, 31 January 2020

लोकतंत्र

हम जो हैं
वर्तमान राजतंत्र के नितारे गए लोग
जब हमने राजतंत्र से ऊब कर
विद्रोह शुरू किया
अधिकारों की मांग रखी
समानता की बात हुई-
तब अविरल विरोद्ध को रोकना
इन राजतंत्रों के लिए जरूरी हो गया
विचारी गयी बात निकाली गयी
बदला या भड़ास निकालने का अधिकार दे दिया जाये
अब हम हर पांच साल में भड़ास निकाल कर ख़ुश हैं
 और फिर साढ़े चार साल तक शांत रहते हैं
और फिर चाचा को हटाकर भतीजा लाते है
और फिर ऐसे ही कभी चाचा कभी भतीजा
अब हमारी क्षणिक ख़ुशी का राज
यही निर्विरोध राजतंत्र-
जिसमें ज्यादा ख़ुशी और कम गुस्से से काम चलता है
न्याय, अधिकार, और समानता की अमर मांग
अब जहन में आने से रह गई है
मात्र सत्ता पलटने की बात
इन सब का उपाय लगने लगी है,
जहां बात बात पर फ़रमानी किताब
चुपी फैलाकर आंख मूंद लेती है
जब कभी जनता और राजा की  मिलावट हो
इसी किताब को छलनी बनाकर
मिलावट नितार दी जाती है
हम साधारण से लोगों को
राजतंत्र या बहरूपिया राजतंत्र से फर्क नहीं पड़ता।
हम गुस्सा निकाल कर खुश हो लेंगे
हमारी ही स्वीकृति से
जो लोग हुकूमत के मद्द में
अन्नदाता या सर्वज्ञ बन गए
उनकी असलियत इतनी ही है कि
इनको गरीबों की गलियां नहीं मिलती;
ठीक तीन लोक के ज्ञाता की तरह-
जिसको अपने ही हाथों से काटा सर नहीं मिला
और परिवारवाद के लिए
मासूम माँ के बच्चे का सर कलम कर दिया
बस ध्यान इतना सा रखा जाता है कि
मौका-ए-वारदात पर माँ को पता न चले
बाद में माँ पर क्या बीतेगी ...
कौन जानने की जरूरत करता है।
क्योंकि अन्नदाता खुद को जनता स्वरूपी
व बेटे को जनता का ही एक अंश बताता है
अत: हमारी तो ख़ुशी का ठिकाना शेष नहीं
हमारे जहन में जो तंत्र है, हमने
उसी का नाम लोकतंत्र रख रखा है।
और लोहे पर लकीर जैसी कोई किताब
की आवश्यकता नहीं रही
हम पहले से ही नितारे गए लोग हैं।

- रोहित
from Google Image 



Tuesday, 3 December 2019

मेरा शुरुआती इतिहास

इतिहास किसी का पुख़्ता नहीं है
चंद दिनांकों व नामों के अलावा
सारे आंकड़े बेबुनियाद है
अलग- अलग किताबों में
किसी एक का अलग-अलग नाम मिल सकता है
उसका वही-वही काम अलग-अलग दिनांकों को हो सकता है।
सम्भवतः ये किताबें आज लिखी गयी हैं
और 2619 साल पुरानी बातें करती हैं।

मैं मेरे गांव से पढ़ लिख कर आया हूँ
स्कूल में जब नाम लिखवाया जा रहा था
तो उस बुजुर्ग ने पांच साल पहले की-
कोई भी तारिक मांडणे को कह दिया होगा
हंसते हुए दोनों ने (अध्यापक और दादा)
मुझे एक नया जन्मदिन दिया।
यहाँ के 1960-70 के दशक के लोगों का जन्मदिन
पांच के पहाड़े पर  या
1 जनवरी, 26 जनवरी, 15 अगस्त या
मई/जुलाई की कोई भी तारीख़ (11 या 21) ज्यादातर होता है।

वही बूढ़ी औरत जो हमें जाड़ों की रातों में
कहानियां सुनाया करती थी जो अपनी दादी से सीख कर आई थी-
बीच मे भूल जाने पर थोड़ी रुकती
और फिर सोच कर, कुछ जोड़ कर पूरा करती।
उसे कहानियों का ख़ाका तो याद था मगर हूबहू शब्द नहीं….
उसको जन्मस्थल याद था ना ही तो अपनी उम्र
दो साल पहले पूछा था
आज भी वही उतर- पिचहतर बरस।

आज जब मुझ से कोशिश हुई
कि मैं मेरा जन्म स्थल जानूं
मैंने मेरे जन्म के प्रमाणों से पूछा जो  कुछ जीवित हैं और कुछ लिखित,
सब किसी गांव का जिक्र तो करते हैं
मगर उंगली के इशारे पर ठीक स्थल नहीं बता पाते
क्योंकि उस कच्ची ढाणी की जगह पक्के मकां उग चुके हैं
और उस सटीक जगह का कोई भी कच्चा या पका निशां बाकी न रखा गया।
स्कूल के रजिस्टर में जो जन्मदिन अंकित है
घर की औरतें अपनी तुलनात्मक गपशपों में इसका खंडन करती हैं
और जो जन्म स्थल है वह झूठा है-
उसी बुजुर्ग ने मूछों को तांव देते हुए
अपने ही घर का पता लिखवाया होगा
जो अब ना ही तो पहले जैसा है
और कई हिस्सों में बंट चूका है।
मगर यही मेरे होने के पुख़्ता सबूत भी हैं।
हो सकता है आज आपको सटीक जन्मदिन पता हो
पर क्या उस जगह को चिन्हित करके रख सकते हो
जहां माँ आपके लिए प्रसव पीड़ा में चीखी हो?
क्या आपको अपने सटीक जन्म स्थल की जानकारी है?
इतिहास किसी का पुख़्ता नहीं है
चंद दिनांकों व नामों के अलावा
सारे आंकड़े बेबुनियाद है।
                                      -रोहित


Wednesday, 13 November 2019

ख़ाका

पुरानी डायरी से कुछ पंक्तियाँ:

  १ 
एक डायरी लिखने का शौक था 
पन्ने दर पन्ने तुझे मुकम्मल करना था 
तू जाती रही 
सब जाता रहा
हम जो रहेंगे झुंझलाहट लिए,
हम जो हैं गुजरे लम्हों के ख़ाका मात्र,
हम जो हैं  लबों में कुलबुलाहट सिये, 
आजीवन छटपटाहट, एक लम्हे का फैसला मात्र । 
             
  २ 
जी का ना लगना 
बेसब्री का सहारा मिलना 
तमाम होना तमाम बातों का 
             
          
   ३ 
जमाने को मैंने देखा इस तरह 
आँखों में गिरी सूरज की किरणें 
थोड़ी सी जली लेकिन 
                            चमकदार हो गयी ।                                                
          
  ४ 
जिसने एक बार 
सफल होने की 
नाकाम कोशिश की हो 
उसके यहां 
धूल फांकती है मोहब्बत । 

                                   - रोहित 

Wednesday, 6 November 2019

जागृत आँख

क्या ही इलाज़ करें खुद का
खुदी से हो नहीं सकता बुलन्द इतना
सहारा मिले तो मिले सकूं
झर रहा है इंसां
गिर गए नाखून
पिंघल रही उंगलियां
रीत गए हैं हाथ
फिर भी ये बेमुद्दा खालिद कितना?

ढाँचा है कि गिरने वाला है
और ताक रहें हैं सब मुझे,
खिलखिलाते हुए
सांचे हाथ में लिए हुए
भूल चुके हैं शिल्पकारी
जब याद आएगी
आ चुकी होगी बारी इनकी
फिर कोई हंसेगा, खिलखिलायेगा
बग़ल में खाली साँचा हाथ लिए
छा जाएगा मौन और देखेगा
हज़ारों चीखों भरी शांति, तब तक 
निकल पड़ेगी आंखे बिना पलक
खून की एक धार बांधे
जा पहुंचेगी उसके पैरों तले
जो आसीन है ऊंचे पद पे
जिसके विध्वंस ही मनोरंजन है
जिसके अपने थे बेरहम मुद्दे
जिनमें उलझे रहे तुम
जिनमें भूले निज कर्म, लड़े तुम
मगर वो होले से कुचलता आया है
हर आख़िरी समय की जागृत आंख को
इस तरह फैल ना सकी
तेरी मेरी क्रांति।

                                - रोहित

Google image से लिया गया।  


Wednesday, 30 October 2019

कविता

मैं बाहर निकलता हूँ
और उठा लेता हूँ 
किसी की भावना से 
खेलता हुआ विषय 
जिस पर कविता बननी होती है 
मैं अपराधी हूँ कविता तेरा 
जो इस विषय पर तुझे लिख रहा हूँ 

वो सहसा ही फूट पड़ी मेरे सामने 
पति के जाने का दुःख तो भूल चुकी
वो समझ चुकी है कि जीना है  
लेकिन हर रोज की घुटन व धीमी मौत  
उसके लिए भारी पड़ रहा है
निढाल होने को मजबूर सी  
उसके गालों की फटन; मावठ के उपरांत 
बरसाती दरिया की तलहटी से मिलती है।  
मुस्कान लेकिन मरी नहीं है चेहरे की 
यही मुस्कान ज़माने को शूल लगती है 
एक विधवा हंस नहीं सकती 
वो पकवान बना नहीं सकती 
मैले-कुचैले कपड़े पहने रहो तो सुहावनी लगती है 
चुपचाप सहन करो तो अच्छी लगती है 
बतिया ले किसी से तो गुलछर्रे उड़ाती है 
इस ज़माने ने अनाथा को 
छुई-मुई का बूटा बना दिया है 
छू ले कोई तो मुरझाना जरूरी कर दिया है। 
क्या नहीं चाहिए एक विधवा को...
कि  उसकी माहवारी आने से रह गयी है ?
कि उसकी छातियों का भार कम हो गया है ?
कि उसके सिर के बाल कट गये हैं ?
कि वो चलने से रही और 
पैरों में कुछ भी पहनने की जरूरत ना रही?
कि गिद्धों की नज़र में बदन बदन ना रहा?
सब की सब जरूरतें ज्यों की त्यों हैं 
फिर वो खुद बाहर निकल क्यों नहीं सकती 
निजी जरूरतों का सामान उसे कौन लाकर दे 
एक पुरुष से मंगवाए तो बेहया हो जाती है 
स्त्री से कहे तो बेईज्जत पुकारी जाती है। 
शक की नजरों से बचाना खुद  को 
क्या सातवाँ अधिकार नहीं बन सकता?  
ज़माने पर वो बोझ नहीं रहना चाहती 
मगर ज़माने को वो बोझरूपी अच्छी लगती है
इसी जमाने में मैं भी हूँ 
जो उसकी चीखों को सुन पाया- और कर क्या रहा हूँ 
बस तुझे लिख रहा हूँ  
लानत है मुझ पर और ढेरों बार है
मुझे पता है तू छप जाएगी 
किसी किताब की आखिरी पन्ने पर 
एक उम्मीद है कि 
कोई समाज का नुमाइंदा इसे पढ़ेगा- 
तो मैं कविता लिख रहा हूँ
दोष रहित स्त्री को कोई आजाद करवाएगा- 
तो मैं कविता लिख रहा हूँ 
किसी के क्रूर रीती रिवाजों पर चोट देगी- 
तो मैं कविता लिख रहा हूँ 
हाशिये में बंद जिंदगी 
कोरे कागज पर उतरेगी तो मैं तुझे लिख रहा हूँ- 
मैं मानता हूँ खूबसूरती को बेदाग ही रखना 
एक निजी जुर्म है मेरी दोस्त 
फिर भी माफ़ी चाहता हूँ।
तुझे जनने के लिए 
मैंने किसी की भावनाओं को 
तेरा विषय बनाया
तू मुझे माफ़ कर देना 
मगर पड़ी रहना उस आखिरी पन्ने पर 
नींव समझी जाएगी या इमारत कोई 
मुझे नहीं पता बस कि मैं तुझे लिख रहा हूँ।

                                                  - Rohit

taken from google image