Wednesday, 6 November 2019

जागृत आँख

क्या ही इलाज़ करें खुद का
खुदी से हो नहीं सकता बुलन्द इतना
सहारा मिले तो मिले सकूं
झर रहा है इंसां
गिर गए नाखून
पिंघल रही उंगलियां
रीत गए हैं हाथ
फिर भी ये बेमुद्दा खालिद कितना?

ढाँचा है कि गिरने वाला है
और ताक रहें हैं सब मुझे,
खिलखिलाते हुए
सांचे हाथ में लिए हुए
भूल चुके हैं शिल्पकारी
जब याद आएगी
आ चुकी होगी बारी इनकी
फिर कोई हंसेगा, खिलखिलायेगा
बग़ल में खाली साँचा हाथ लिए
छा जाएगा मौन और देखेगा
हज़ारों चीखों भरी शांति, तब तक 
निकल पड़ेगी आंखे बिना पलक
खून की एक धार बांधे
जा पहुंचेगी उसके पैरों तले
जो आसीन है ऊंचे पद पे
जिसके विध्वंस ही मनोरंजन है
जिसके अपने थे बेरहम मुद्दे
जिनमें उलझे रहे तुम
जिनमें भूले निज कर्म, लड़े तुम
मगर वो होले से कुचलता आया है
हर आख़िरी समय की जागृत आंख को
इस तरह फैल ना सकी
तेरी मेरी क्रांति।

                                - रोहित

Google image से लिया गया।  


Wednesday, 30 October 2019

कविता

मैं बाहर निकलता हूँ
और उठा लेता हूँ 
किसी की भावना से 
खेलता हुआ विषय 
जिस पर कविता बननी होती है 
मैं अपराधी हूँ कविता तेरा 
जो इस विषय पर तुझे लिख रहा हूँ 

वो सहसा ही फुट पड़ी मेरे सामने 
पति के जाने का दुःख तो भूल चुकी
वो समझ चुकी है कि जीना है  
लेकिन हर रोज की घुटन व धीमी मौत  
उसके लिए भारी पड़ रहा है
निठाल होने को मजबूर सी  
उसके गालों की फटन; मावठ के उपरांत 
बरसाती दरिया की तलहटी से मिलती है।  
मुस्कान लेकिन मरी नहीं है चेहरे की 
यही मुस्कान जमाने को शूल लगती है 
एक विधवा हंस नहीं सकती 
वो पकवान बना नहीं सकती 
मेले कुचले कपड़े पहने रहो तो सुहावनी लगती है 
चुप चाप सहन करो तो अच्छी लगती है 
बतिया ले किसी से तो गुलछर्रे उड़ाती है 
इस जमाने ने अनाथा को 
छुईमुई का बूटा बना दिया है 
छू ले कोई तो मुरझाना जरूरी कर दिया है। 
क्या नहीं चाहिए एक विधवा को...
कि  उसकी माहवारी आने से रह गयी है ?
कि उसकी छातियों का भार कम हो गया है ?
कि उसके सिर के बाल कट गये हैं ?
कि वो चलने से रही और 
पैरों में कुछ भी पहनने की जरूरत ना रही?
कि गिद्धों की नज़र में बदन बदन ना रहा?
सब की सब जरूरतें ज्यों की त्यों हैं 
फिर वो खुद बाहर निकल क्यों नहीं सकती 
निजी जरूरतों का सामान उसे कौन लाकर दे 
एक पुरुष से मंगवाए तो बेहया हो जाती है 
स्त्री से कहे तो बेईज्जत पुकारी जाती है। 
शक की नजरों से बचाना खुद  को 
क्या सातवाँ अधिकार नहीं बन सकता?  
जमाने पर वो बोझ नहीं रहना चाहती 
मगर जमाने को वो बोझरूपी अच्छी लगती है
उस जमाने में मैं भी हूँ 
जो उसकी चीखों को सुन पाया- और कर क्या रहा हूँ 
बस तुझे लिख रहा हूँ  
लानत है मुझ पर और ढेरों बार है
मुझे पता है तू छप जाएगी 
किसी किताब की आखिरी पन्ने पर 
एक उम्मीद है कि 
कोई समाज का नुमाइंदा इसे पढ़ेगा- 
तो मैं कविता लिख रहा हूँ
दोष रहित स्त्री को कोई आजाद करवाएगा- 
तो मैं कविता लिख रहा हूँ 
किसी के क्रूर रीती रिवाजों पर चोट देगी- 
तो मैं कविता लिख रहा हूँ 
हाशिये में बंद जिंदगी 
कोरे कागज पर उतरेगी तो मैं तुझे लिख रहा हूँ- 
मैं मानता हूँ खूबसूरती को बेदाग ही रखना 
एक निजी जुर्म है मेरी दोस्त 
फिर भी माफ़ी चाहता हूँ।
तुझे जनने के लिए 
मैंने किसी की भवनाओं को 
तेरा विषय बनाया
तू मुझे माफ़ कर देना 
मगर पड़ी रहना उस आखिरी पन्ने पर 
नींव समझी जाएगी या इमारत कोई 
मुझे नहीं पता बस कि मैं तुझे लिख रहा हूँ।

                                                  - Rohit

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Thursday, 17 October 2019

लोग बोले है बुरा लगता है

जो अच्छी लगती, बुरा नहीं लगता
रूह से जा लगती, बुरा नहीं लगता

क्यों न हो तुझ में कोई खामी
मुझी से हो पुरी बुरा नहीं लगता

वहशत ना होती बाल नोचने तक
हिज़्र नहीं होती  बुरा नहीं लगता

कांरवा गुजर गया अपनी हद्द से
होता नज़र तो भी बुरा नहीं लगता

हनोज़ छाई चुपी है, दुरी है बहुत
होती दो टुक ही बुरा नहीं लगता

लोग बोले है बुरा लगता है, तुझे लगता
हाय! तू भी बोलती,  बुरा नहीं  लगता

मैंने पूर्व  के  बाद पश्चिम  ही  को  जिया  है
पापा ने जवानी भी दी होती बुरा नहीं लगता

एक वक्त हुआ मैं जुदा नहीं हुआ मुझ से
तू होती और बेल कराती  बुरा नहीं लगता

दम घुट रहा है  ऐसी  मोहब्बत  में
तोड़ जाती दम ही बुरा नहीं लगता.
                               
                                             -रोहित 

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Friday, 11 October 2019

ख़ुदा से आगे

अभी तो मैं ख़ुदा तक  हूँ 
आँखों में नूर ज्योत्स्ना सा,
मन कोमल,निर्मल,दिलनवाज़ी,
मंद मंद मुस्कुराहट व लावण्य 
जब भी सुनूं आहट जानी-पहचानी 
बजता है इकतारा दिल में और
दिल-मोहल्ले में नाचती हो तुम। 

बीते मिलन से अब तक
आवरण भी महक रहे हैं तेरी खुशबु से-
जबकि हर पल अनजानी हवा में रहते हैं
फिर ये सांसे क्यों न बहके
जो सिर्फ तुमसे संबंध रखती है.

पहले मिलन से पहले न था ऐसा, था बंजर
मेरी नग्न भंगिमा को तूने आवरण दिया 
तेरे सिलसिलेवार जलाभिषेक से,
बीज अंकुरित अब होने लगे
प्रत्यक्ष, जीवित, प्रामाणिक
रचियता बना देगा तू मुझे।

बेशर्ते तुम हो करीब
आलिंगन की तरह
वरना ओर कोई बात नहीं-
वही बंजर, वीराँ, बे-जाँ मैं
हाँ, तुम ही तो हो गोया
मेरे पैर पर अपने पैर रख कर
कदमों को दृढ़ बनाने वाली
मुझ में ख़ुदाई लाने वाली।

बाक़ायदा तुम भी वही हो जो मैं हूँ
तुम भी अभी ख़ुदा तलक हो 
जरुरी है दोनों लिंगों का अस्तित्व-
जरूरत है ये अस्तित्व के लिए  
प्रेम-परिणाम अभिपोषित करने के लिए
विरासत एक छोड़ने के लिए।

यूँ तो न बना होगा मिसाल 
सूरज ने भी कभी फेंका होगा अँधेरा 
तब जाकर रोशन हुआ होगा, 
इस रौशनी के बाद भी कुछ होगा 
तब तक रहेंगे हम 'हम'
बाद अँधेरा फैलना है 
जहां आदमी होगा न औरत
इस भेदभाव से परे
होना है एकमेक
एक स्वरूप निराकार।
                                                                        
                                                            - रोहित

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Saturday, 5 October 2019

अश्विनी: परिचय (न्यू ब्लोगर)

वैसे तो कोई भी शख़्स का परिचय देना महज एक औपचारिकता है क्यूंकि वही शख़्स आने वाले वक्त में अपने कर्मों से पहचाना जायेगा।
इसी पर ग़ालिब सा'ब का एक शेर मुझे याद आता
पूछते हैं वो कि 'ग़ालिब' कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या
ब्लॉग जगत पर यूँ तो बेइंतहा प्यार लुटाने व उत्साह बढ़ाने वालों से लबालब भरा पड़ा है। लेकिन कुछ दिनों से ब्लॉग जगत पर ऐसे लोगों से सम्पर्क में हूँ जो शायद मशीनी लोग है. हर दम एक'जैसे व्यवहार की वजह से ये लोग मेरे अंदर झुंझ पैदा करते हैं... ऐसे लोग कभी किसी की रचना नहीं पढ़ते और फिर भी प्रतिक्रिया देते हैं। यही मशीनी मानसिकता हमारे साहित्य को धर दबोच लेगी। इसे बदलना पड़ेगा।
जो थोड़ा अच्छा लिखते हैं और किसी मंच से बोलने का जिनको मौका नहीं मिलता उन के लिए ब्लॉग किसी वरदान से कम नहीं बेशर्ते उनको अच्छे पाठक व उनकी रचना पर सच्ची और आलोचनात्मक प्रतिक्रिया मिले। ब्लॉग जगत ने बहुत से अच्छे लेखकों को यूँ ही खो दिया क्योंकि या तो यहां उनको ये मशीनी लोग मिले या उनके पंख उस गति से ना फ़ैल पाए जिसकी उम्मीद वो करते थे. "मुझे ब्लॉग पर ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़े" यही सोच लेकर एक साहित्य सृजनकर्ता ब्लॉग बनाता है मगर यहां नए ब्लॉगर को कोई फॉलो नहीं मिलता है ... मुझे नहीं लगता कि किसी को फॉलो करना आफ़त भरा काम है।
साहित्य को प्रेम करना एक साधारण सी बात है लेकिन उसी साहित्य को जीना एक अनोखी बात है। इसी अनोखी बात की वजह से मैं 'अश्विनी' को ब्लॉग पर लेकर आया. अभी वो साहित्य की जीवन रेखा में शैशवास्था पर हो सकता है मगर 'पूत के पैर पालने में नज़र आ जाते हैं'.  अश्वनी को आप जब भी पढोगे कुछ तो नया जरूर पाओगे। इनकी लिखी पहली ही रचना की 2-4 पंक्तियाँ हैं कि
किसी का वक़्त इतना अच्छा है कि वक़्त रोक लेना चाहता है,

और एक मैं जो इस वक़्त को रफ्तार देना चाहता हूं...


क्यूंकि शायद एक वक़्त के बाद ये दीवार मीट जाएगी,

जो आज मुझमे मिटाने की हिम्मत नहीं है.


ऐसी बातें और ये अहसास आज तक कितने लोग लिख पाएं होंगे!!!
ब्लॉग पर काफी सालों की मेहनत से  मैंने एक जिम्मेदार परिवार बनाया है उसी परिवार में एक कड़ी और जोड़ रहा हूँ. अब हमारा कर्तव्य बनता है कि हम एक समायोजित वातावरण बनाएं ताकि अश्विनी ही नहीं बल्कि हर एक नया ब्लॉगर इस कड़ी का दमदार हिस्सा बन सके.
अश्वनी के ब्लॉग का लिंक http://ashwinidhundharaofficial.blogspot.com/2019/09/blog-post_30.html
प्लीज् इनसे जुड़ें। आपके (अनुभवी सृजनकर्ता) आशीर्वाद और स्नेह की भूख हमेशा सताती है।
             

                                                                                                                                        आभार।











Friday, 27 September 2019

शून्य पार

फ्रॉम गूगल इमेज 

खुद ही को खोकर 
पूर्णता,लक्ष्य हासिल करना या
जिसे जीना समझे हैं हम  
महज मरने की प्रक्रिया थी
पल पहले जो भी था 
मैं ख़ाक ही तो हुआ उतना.
सब मरने में लगे है
रोज अपना अपना सफर
तय किये जाते हैं
जितना उग चुके हैं
उतना ही पतझड़ में
झड़ना चाहते हैं
फिर जीना क्या है??

एक बसंती आवरण बनता जाये 
उसमें एक कली हो जो कभी खिले ना
पर खिलने को आतुर ही रहे, 
एक सफर हो जो तय ना हो
एक अंतहीन संगीत 
और राग लगते जाएँ, 
जहां क्रियाओं का दोहराव न हो
एक दर्द जिसमें आराम ना हो
इजहार के बाद चैन ना हो
डर ऐसा हो जो लगता रहे,
जीतने वाले ही रहें, जीत ना हो-
वो मुख़्तसर सा लम्हा बना ही रहे,
बदलाव बन न पाए
ताज़गी अमिट हो.
शबनम हो जो सूखने से रहे
ठुलने से न जाये।
यानी एक ठहराव
हर एक ज़र्रे का-
(इसे परम् आत्मा से
मिलन न समझा जावे
ये तो नीरी भूख है
निरन्तर जीने की
लालचन! खोल दर खोल
की भटकन है।)
ये बात शून्य की है 
बस शून्य हो जाना
शून्य भी ऐसा कि अथाह शून्य 
यही तो मौलिकता है।
जहां से सवाल उठता है
मुखौटे के वजूद का
और उत्तर का कोई छोर नहीं।

- रोहित 

Thursday, 19 September 2019

अंदाजे-बयाँ कोई और

फ्रॉम गूगल इमेज 
कब तलक  हक़  जमाओगे, है  कोई और
दम निकलेगा तभी मानोगे था कोई और

जबरन  ब्याही  गयी  संग  कोई   और
पखेरूओं  की  फिक्र  करे   कोई   और

सुलगती  थी  वो   अब   आराम  से  है
जल पड़ी  जो  अब  बुझेगी  कोई  और

मज़हबी तीर पार बोला जंगे-इश्क में
खुदा एक है ये याँ समझे है कोई और

थी बात कि तेरा मेरा किसने बांटा है
फिर कैसे  कहें  रक़ीब  को कोई और

बावजूद ताल्लुकात जिंदा हैं  हैरत  है मुझे
होती मोहल्ले में जीता दम भर कोई और

निकलते आफ़ताब  को देखा  होगा  ढलते  दिन  ने
हम थकन में हैं उस क्षितिज की बात करे कोई और

अव्वल तो  हम बेहूदा जान  पड़ते हैं, नामुमकिन  है
पर समझने की क्षमता से परे पाओगे हमें कोई और

हम अपनी टीस की ख़ातिर उनसे पूछे जाएं
वो बेकरारी में हमसे कहे जाए - है कोई और

हमने शेरो-शायरी की और जी भर के की
क्या बताना अब भी है भूख थी कोई और

कहते हैं था ग़ालिब का अंदाजे-बयां और
फ़रमाते हम भी हैं अंदाजे बयाँ कोई और.

-रोहित 

Monday, 5 August 2019

कायाकल्प

जब 'यह' क्रूर या निर्दयी है 
तब उन लोगों ने किनारा किया 
जिन्होंने मेरे शानदार दिनों में 
अपना भरण पोषण करवाया 
छोटी छोटी चीजों के लिए 
मोहताज़ रहे  इनको  
जरा भी नहीं तरसाया।
तरस आये मुझ पर
ये चाहत भी नहीं मेरी
अलावा इस धुंधली नजर की नजर में तो रहे
ये चंद पोषित जिव,
ताकि बता सकूं कि जो दाढ़ी बढ़ आई है 
शूलों की तरह चुभती है और झुंझ मचल रही है।  

फ्रॉम गूगल 

वो कमरा ना दे जिसमें कोई आता जाता ही ना हो 
पर  वही कमरा भयानक
इसमें रोशनी करना भी मुनासिब ना समझा उन्होंने 
यही अँधेरा मेरे लिए राहत की बात है।   

एक घड़ा खटिया से दूर
दवाइयां अंगीठी में ऊंचाई पर 
चश्मा भी इधर ही कहीं होगा 
ये सब मेरी पहुँच से दूर 
लेकिन मेरे लिए छोड़े।  
एक जर्जर देह 
जिसमें कोई शक्ति शेष न रही
और झाग के माफ़िक सांसें, 
मुझे ही मेरे लिए छोड़ दिया।

ऐसी हालात में भी एक काम 
मुझ से बहुत बुरा हुआ कि 
इन दिनों मैं मेरे पौत्र की नजर में रहा।   


छोड़ के जाने वाले मेरे अपने
तृप्त हैं , संतुष्ट हैं  और  हैं दृढ   
कि मेरा दुःख मैं अकेला उठाऊं
इस शांति से पहले की बैचैन सरसराहट को
सुने बगैर
देर किये बगैर  
उन्होंने तो धरती भी खोद ली होगी 
या सोचा होगा आसमान को काला करेंगे।
मुझे याद आता है 
घर के दरवाजे तक साथ आकर उनसे विदा लेना  
या उनको पाँव पर खड़ा करना
या उनकी जरूरतों को उनकी गिरफ़्त में करवाना 
सहारा देना....हूं ... सहारा बनना....
ओ जीवनसाथी तू याद आया 
अब तो मुस्कुरा लूँ जरा। 

                                                                          -रोहित 


Sunday, 20 January 2019

ठीक हो न जाएँ

from गूगल image 


एक लिबास पहने दुनियां चल रही है
कहीं हमारी, कहीं तुम्हारी चल रही है

मैं बड़ा खौफज़दा हूँ इन दिनों उनसे
और उनकी ये जिम्मेदारी चल रही है

ठीक हो न जाएँ- खुश रहते हैं अब
दुआ मांगते हैं, दवाई चल रही  है

हर बार की सियासत में यही होता है
चुप रहूँ मैं कि उनकी बारी चल रही है

खोकर भी उनको हम आराम से बैठे हैं
कोई लाचारी सी लाचारी चल रही है

सोचता हूँ उसके लिए रो कर देखा जाये
इश्क़ में इश्क से ईमानदारी चल रही है

आगे ओर रौनकें कमतर हैं, होश मदहोश है
दिल मुहल्ले में पिया जी की सवारी चल रही है.

                                          - Rohit








Thursday, 10 January 2019

हिंदी




                                         "माँ
                                         गर तू न होती
                                         मैं तो गूंगा होता,
                                         मेरे अक्लोहोश की कोई बुनियाद होती!? "
                                                                                              -Rohit