Thursday, 9 October 2014

सब थे उसकी मौत पर (ग़जल 2)




from Google image


प्यार  की नियत, सोच, नज़र  सब  हराम  हुई
इसी सबब से कोई अबला कितनी बद्नाम हुई.

इंतजार, इज़हार, गुलाब, ख़्वाब,  वफ़ा,  नशा
उसे पाने की कोशिशें तमाम हुई सरेआम हुई

नहीं,तेरा पलट के देखना, तेरा पुकारना बरमल्ला
अपनी  मोहब्बत तो  तेरे चले  जाने  से आम  हुई

बढ़ी हुई  दूरियां  मोहब्बतों  में  तब्दील  हो गयी 
बच्चपन तो बच्चपन था जवानियाँ नीलाम हुई 

सब थे उसकी मौत पर आये हुए जो दिन में मरी 
न था तो कोई उस मौत पर जो उसे हर शाम  हुई.

"रोहित"

29 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (10.10.2014) को "उपासना में वासना" (चर्चा अंक-1762)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।दुर्गापूजा की हार्दिक शुभकामनायें।

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपका बहुत बहुत आभार वीर जी

      Delete
  2. इंतजार, इज़हार, गुलाब, ख़्वाब, वफ़ा, नशा
    उसे पाने की कोशिशें तमाम हुई सरेआम हुई------ वाह !!! प्रेम की सुंदर और कोमल गजलनुमा रचना --
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बधाई


    ReplyDelete
  3. वाह.... बहुत उम्दा ग़ज़ल ....

    ReplyDelete
  4. Itna sab paane ki koshish wo bhi sareaam .. Maare jaayenge :) bahut hi lajawaab bhivyakti aanand aaa gya pdhke beshk !!

    ReplyDelete
    Replies
    1. मारे जायेंगे नहीं मारे गये कहो :) :)

      Delete

  5. बढ़ी हुई दूरियां मोहब्बतों में तब्दील हो गयी
    बच्चपन तो बच्चपन था जवानियाँ नीलाम हुई

    बचपन तो बचपन था सुन्दर प्रयोग

    ReplyDelete
  6. बहुत सुंदर गजल.रोहित जी!
    धरती की गोद

    ReplyDelete
  7. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति ।मेरे पोस्ट पर आप आमंश्रित हैं।!

    ReplyDelete
  8. 'न था तो कोई उस मौत पर जो उसे हर शाम हुई.''.......जो शायद इस मौत से भी कई गुना तकलीफ़देह थी !!!!!
    दर्पण सरीखी रचना !

    ReplyDelete
  9. आपने बहुत खुब लिख हैँ। आज मैँ भी अपने मन की आवाज शब्दो मेँ बाँधने का प्रयास किया प्लिज यहाँ आकर अपनी राय देकर मेरा होसला बढाये

    ReplyDelete
  10. शब्द जैसे ढ़ल गये हों खुद बखुद, इस तरह गजल रची है आपने।

    ReplyDelete
  11. आभार आपका भाई जी-
    बढ़िया रचना-सुन्दर भाव-
    बधाइयां-

    ReplyDelete
  12. मैं कुछ ना कह सकी
    शब्द उचित मिल न सके

    ReplyDelete
  13. बहुत खूब ... उम्दा शेर हैं सभी इस ग़ज़ल के ...

    ReplyDelete
  14. वाह !
    बेहतरीन

    ReplyDelete
  15. सब थे उसकी मौत पर आये हुए जो दिन में मरी

    न था तो कोई उस मौत पर जो उसे हर शाम हुई.
    ....वाह...लाज़वाब अहसास...

    ReplyDelete
  16. नहीं,तेरा पलट के देखना, तेरा पुकारना बरमल्ला
    अपनी मोहब्बत तो तेरे चले जाने से आम हुई
    ..बहुत खूब .

    ReplyDelete
  17. बहुत ही शानदार और भावपूर्णं रचना। दिल में गहरी उतर गई यह रचना। अच्छे लेखन के लिए आपको बहुत बहुत बधाई।

    ReplyDelete