Thursday, 18 September 2014

पासबां-ए-जिन्दगी: हिन्दी

आँखों के सामने
जीते जी मार दिया है

कुछ 'हमपरवाजों' ने
ना समझी में
उसे जो जिन्दा है
मुझ में
और मेरे बाद
मेरे लिखित अलिखित अल्फाजों में,
मुमकिन है उनमें भी, जो
इसके सम्मान को कम लिखते हैं
गिरा लिखते हैं.

हिंदी अजर है
और अमर रहेगी
कैसी सोच, कैसे दिन हैं
ये भी बताना पड़ता है उनको
जिन्होंने इसे काबिले-रफ़ू समझा
उनकी पासबां है हिंदी
जब भी लिखने बैठता हूँ अल्फ़ाज़
मेरी जबीं को चूमती सी लगती है हिंदी
माँ की तरह
जो एक दुसरे में 
प्राण फूंकते रहते हैं.

        "रोहित"

हमपरवाज़= साथ में उडान भरने वाले, काबिले-रफ़ू = रफ़ू कराने योग्य,   पासबां = द्वारपाल, जबीं = ललाट


19 comments:

  1. बहुत सुन्दर सटीक भावपूर्ण अभिव्यक्ति हिंदी के नाम पर अपनी बिंदी चमकाने वालों को खबरदार करती सी।

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  2. बहुत सुन्दर सटीक भावपूर्ण अभिव्यक्ति हिंदी के नाम पर अपनी बिंदी चमकाने वालों को खबरदार करती सी।

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  3. सुंदर व बेहतरीन रचना

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  4. हिंदी और उर्दू के शब्दों का अनोखा मेल...

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  5. Bahut sunder rachna ki prastuti .....umdaa!!

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  6. भाषा को मारना संभव नहीं होता ... ऐसे प्रयासों से तो खास कर ...
    भावपूर्ण अभिव्यक्ति ....

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  7. अच्छी भावपूर्ण रचना !
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है

    राज चौहान
    http://rajkumarchuhan.blogspot.in

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  8. आदरणीय रोहित जी! हिन्दी ऐसी भाषा है, जो हमेशा रहेगी! सुंदर ब्लॉग के लिए सादर धन्यवाद!
    धरती की गोद

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  9. खूबसूरत अंदाज़ की राष्ट्र प्रेम से आप्लावित रचना शुक्रिया आपकी टिप्पणी का।

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  10. हिंदी अजर है
    और अमर रहेगी.....
    बहुत खूब

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  11. बहुत सुन्दर !

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  12. सुन्दर सार्थक चिंतन .

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  13. सुन्दर सटीक भावपूर्ण

    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है

    http://sanjaybhaskar.blogspot.in/

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  14. 'माँ' की तरह हिन्दी..बहुत अच्छी सोच ! उम्दा अभिव्यक्ति !

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