Thursday, 4 September 2014

रंगरूट

एकांत में बैठा
सुन्न शरीर  और

खुली आँखों से भी 
दिन की चहल पहल और 
रात के तारे भी
नजर नहीं आते.
ख्याल में डूबा है
कोई रंगरूट कि 
क्यों जान लेती है
सीमा पार से
आई गोलियां
हर रोज होता है
उल्लंगन
और बनता है तमासा
अपनों की मोत का
अभ्यास में भरे
जज्बे जोश को क्यों
बेकद्री में रखा गया 
क्यों लगता है जैसे
बैठें हों अपने ही घर में दुबक कर
और मुन्तजिर हो अपनी मौत का.
गरमा जाती है सियासत
चंद दिनों के लिए, मगर
रंगरूटों के

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हिम्मती  हौसलों और जज्बातों पर
बेख्याली के पर्दे डले है

उस पार
मखौल बना है हमारा
कमजोर और बुझदिली का
तभी तो हिम्मत हैं उनमे कुकृत्य की

ये दस्तक ही है ऐसी मौतों की
चंद परिवारों के अलावा
किसको फर्क पड़ेगा।

                                           By :-            
                                           रोहित


रंगरूट = नए सैनिक   मुन्तजिर = प्रतीक्षित


27 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (05.09.2014) को "शिक्षक दिवस" (चर्चा अंक-1727)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  2. अच्छी रचना।
    चित्र सब कुछ बोल रहे हैं।

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  3. उस पार
    मखौल बना है हमारा
    कमजोर और बुझदिली का
    तभी तो हिम्मत हैं उनमे कुकृत्य की

    ये दस्तक ही है ऐसी मौतों की
    चंद परिवारों के अलावा
    किसको फर्क पड़ेगा।

    कटु यथार्थ ,मार्मिक प्रसंग।

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  4. उस पार
    मखौल बना है हमारा
    कमजोर और बुझदिली का
    तभी तो हिम्मत हैं उनमे कुकृत्य की

    यूं सरे आम कहना सच को ,सच मान लो जुर्म है इस बे -दिल व्यवस्था में।

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  5. वाह... बेहतरीन..

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  6. मार्मिक रचना..

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  7. देशप्रेम का जज्बा लिए सुन्दर प्रस्तुति
    शिक्षक दिवस की हार्दिक मंगलकामना

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  8. देशप्रेम का जज्बा लिए सुन्दर प्रस्तुति

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  10. सत्य कभी-कभी कठोर होते हैं,राजनीति और देशभक्ति दो विपरीत दिशाएं है हलांकि साथ-साथ भी चलना होता है आज के परिद्रुश्य में.

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  11. संवेदनशील बात उठाई है। वाकई फर्क प्रकट झेलनेवालों के अलावा किस को पड़ता है।

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  12. गहरे भाव ... सच है किसी को फर्क नहीं पड़ता सिवाए उनके जो भोगते हैं ...

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  13. Gazab!
    Sahaj Baat, jhakjhortee samvedna aur rekhankit kartee ek aisee bebasee jo dikhaaee nahin detee.
    aur ek atirikt dukh, is baat ka, ki nahin kar paatee vah bhee
    jo kar sakte hain
    jiske liye taiyyar hain
    par ummeed hai ab hogee naee baat
    jagega jajba, ham sab hain saath saath

    Achchee aur saarthak aur mahatvpurn rachnaa
    ke liye badhaaee
    Ashok Vyas

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  14. शुभ संध्या रोहित
    अच्छी रचना पढ़वाई आपने....
    समझ पाने वाले को इशारा काफी है
    और
    आभारी हूँ
    नयी पुरानी हलचल में आपने विस्तृत प्रतिक्रया हेतु
    सागर भर दिया आपने.....

    सादर....

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  15. सुंदर रचना है रोहित जी, अच्छे भाव , सामयिक भी एवं यथार्थ परक भी । एक इल्तिजा है , वर्तनी को एक बार अवश्य जांच लें ॥

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  16. वाह...सुन्दर और सार्थक पोस्ट...
    समस्त ब्लॉगर मित्रों को हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं...
    नयी पोस्ट@हिन्दी
    और@जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ

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  17. बहुत ही बढ़िया


    सादर

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  18. चंद परिवारों के अलावा,
    किसको फर्क पड़ेगा।
    अक्षरशः सत्य !

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  19. भावपूर्ण रचना ! बोलते हुए चित्र !

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  20. सुन्दर ,....धन्यवाद !

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  21. बहुत सटीक और भावपूर्ण प्रस्तुति...

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  22. Saarthak prastuti ke liye badhayi aapko....!!

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