Thursday, 6 December 2012

दर्पण सा बना मैं

मैं,
साधारण सा कांच 
Image courtesy-Google.com
जेसे 'शीशागर' ने बनाया
एकदम पारदर्शी,बिल्कुल साफ

पर ज्यूँ ही तूँ आई इस कांच के सामने
अपनी पारदर्शिता ख़त्म कर ली मैंने,
एक तरफ चाँदी की परत आ गयी हो जेसे
जैसे किसी ने जादू कर दिया हो.

मैंने कैद कर लिया तुम को,
मेरे हर ज़र्रे में समाई हो तुम
दूर से देखना कभी दम-ब-खुद सा पड़ा हूँ
अन्दर झांक कर देखना कभी
तेरा ही अक्स लिए खड़ा हूँ.
तेरे लिए थोड़ा सा बदला हूँ
कांच से बस दर्पण ही बना हूँ।

      By-
~*रोहित *~

शीशागर=भगवान(कविता के अर्थ में)/ कांच का सामान बनाने वाला (शाब्दिक अर्थ)



29 comments:

  1. 'तेरे लिए थोड़ा सा बदला हूँ
    कांच से बस दर्पण ही बना हूँ।'
    - तू तू करता तू भया, मुझमें रही न हूं।
    वारी फेरी बलि गई जित देखूँ तित तूं।

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  2. सुन्दर अति सुन्दर रोहित भाई वाह कोई जवाब नहीं आपका खास कर ये पंक्तियाँ तो बस लाजवाब हैं

    पर ज्यूँ ही तूँ आई इस कांच के सामने
    अपनी पारदर्शिता ख़त्म कर ली मैंने,
    एक तरफ चाँदी की परत आ गयी हो जेसे
    जैसे किसी ने जादू कर दिया हो.

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  3. वो आयी चांदी की परत की तरह...
    बहुत सुन्दर.....
    लाजवाब बिम्ब...

    अनु

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  4. पर ज्यूँ ही तूँ आई इस कांच के सामने
    अपनी पारदर्शिता ख़त्म कर ली मैंने,
    एक तरफ चाँदी की परत आ गयी हो जेसे
    जैसे किसी ने जादू कर दिया हो.
    बहुत सुन्दर v सार्थक अभिव्यक्ति .आभार माननीय कुलाधिपति जी पहले अवलोकन तो किया होता

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  5. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

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    1. आपका तहे दिल से शुक्रिया गुरु जी. :))

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  6. बहुत खूब,सार्थक अभिव्यक्ति,रोहितास जी,,,

    recent post: बात न करो,

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  7. bahut pasand aayi aapki rachna

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  8. प्रेम को सर्व व्यापी रूप देते सर्वथा नवीन बिम्बों का प्रयोग करके आपने रचना को प्रेम को सर्वयापी सर्व्याप्त कर दिया है .

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  9. बहुत खूब....कांच से दपर्ण बना..

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  10. "तेरे लिए थोड़ा सा बदला हूँ
    कांच से बस दर्पण ही बना हूँ।" लाजवाब..!!!

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  11. बहुत खूब !
    आईने में दीखता है, मुझे तेरा अक्स,
    अश्कों की आखों में झड़ी देखता हूँ।
    खुद को देखता हूँ, बिखरते हुए जब,
    हाथों में तेरे प्रेम की हथकड़ी देखता हूँ।

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  12. बहुत ही बढ़िया


    सादर

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  13. बहुत खूबसूरत लिखा वाह बहुत पसंद आया

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  14. खुद को देखता हूँ, बिखरते हुए जब,
    हाथों में तेरे प्रेम की हथकड़ी देखता हूँ।
    ............बहुत ही सुंदर

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  15. रोहित जी, बहुत ही खूबसूरत है यह ... काँच का दर्पण बनना... सुन्दर रचना!

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  16. कांच से दर्पण बना हूँ , कितना बारीक वर्णन |

    सादर

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  17. कल 10/12/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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    1. माथुर जी आपका बहुत बहुत आभार।

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  18. कांच से दर्पण का रूपान्तरण ,चांदी की पर्त और शीशे में बस तू ही तू ...बढ़िया बन पड़ी है यह रचना कसावदार बुनावट लिए एक शब्द फ़ालतू नहीं है .

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  19. http://bulletinofblog.blogspot.in/2012/12/2012-8.html

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  20. बहुत सुन्दर आपकी लेखनी है ....कृपा कर मेरी भी रचनाये देखें और सलाह दें ।










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  21. बहुत सुन्दर लिखा है...
    सुन्दर-सुन्दर बिम्बों ने रचना में चार चाँद लगा दिए...
    बहुत खूब....
    :-)

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  22. उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

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  23. लाजवाब है जी ...आपको पहली बार पढ़ा बढ़िया लगा ...आप भी पधारो मेरे घर पता है ....
    http://pankajkrsah.blogspot.com
    आपका स्वागत है

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  24. कल्पनामई कल्पना !
    सार्थक शब्दों की अल्पना !
    शब्द तूलिका प्रभावपूर्ण !

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  25. very nice..bhaiji bahut khoob likhte ho:)

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