Wednesday, 12 September 2018

बेकरारी से वहशत की जानिब

उस सिलवटों भरे बिस्तर से
उस सोच से जिसमें तू रहता है
तन्हाई वाले ख्यालों से
उस तबियत से
बगैर तेरे जो रफ्ता रफ्ता बिगड़ रही है
विचारहीन खुली आँखों से,मध्य चांदनी रात में-
तन्हा बीते लम्हें और दो कस की उस लत से
जीना जहाँ से दुर्भर हो गया है -से
बटोर कर देखना नींद मेरी
सुखकर दमड़ी में कहीं दरारें न पड़ जाएँ तेरी
उक चुक समय की दवा दारू
पर असर तेरा,बेअसर सब.

दो कस धुंए के छलों से
नोचना जिन्दगी
छलकते जाम से गटकना जिन्दगी
तुम मुझ से जानो
तेरे बिन जो गुजरी जिन्दगी
जिन्दा लेकिन बेदम जिन्दगी,
आँख में पानी,गला भारी
कांपते होठों से बोलती जिन्दगी,
रात को सोती दुनियां जागता मैं
एक कोने में बीमार पड़ी जिन्दगी,
पहली किरन से लोगों की ये चहल पहल
उगता सूरज और ये मेरी डूबती जिन्दगी,
तेरी "ना" में न चाहते हुए मेरी मंजूरी
होके मजबूर मजबूरी में खिलती जिन्दगी-

हाँ
मौजूद है खिलखिलाती हंसी में तू
पागलपन में तू
और ये फूटते सिर में सिर दर्द सी जिन्दगी
मगर तौबा करूं तो इस जिन्दगी से कैसे
रूह में समाई 'तू' जिन्दगी
तेरा इंतजार जिन्दगी.
मौत से भी मौत आएगी नहीं
रूह से तो आदत जाएगी नहीं
गर है हकीकत पुनर्जन्म की
यहीं कहानी होगी और यही जिन्दगी.

--रोहित--

from Google image 
(2013 में लिखी गयी रचना जिसे भुला दिया गया था आज वापिश पढने को मिली तो शेयर कर रहा हूँ.
उस वक्त लेखन कला से  मै बिलकुल अनजान था.)

हिंदी दिवस पर मेरी रचना पासबां-ए-जिन्दगी: हिन्दी  

13 comments:

  1. मौजूद है खिलखिलाती हंसी में तू
    पागलपन में तू
    और ये फूटते सिर में सिर दर्द सी जिन्दगी

    वाह....., बहुत खूब ...।।

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १४ अगस्त २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  3. आँख में पानी,गला भारी
    कांपते होठों से बोलती जिन्दगी,
    रात को सोती दुनियां जागता मैं
    एक कोने में बीमार पड़ी जिन्दगी,
    पहली किरन से लोगों की ये चहल पहल
    उगता सूरज और ये मेरी डूबती जिन्दगी,
    तेरी "ना" में न चाहते हुए मेरी मंजूरी
    होके मजबूर मजबूरी में खिलती जिन्दगी- बेहद खूबसूरत रचना आदरणीय

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  4. नोचना कर लें। सुन्दर रचना।

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    1. धन्यवाद जोशी जी

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  5. वाह क्या बात हैं
    एक दर्द और कसक की जब इन्तहा हो जाती हैं तभी उसका निचोड़ ऐसा रूप ले पाते हैं.हर बात कही और लिखी नहीं जा सकती .कुछ लाइन्स तो जैसे तड़फ की सीमा के पार ले गयी .मज़ा आ गया रोहितास जी आप बहुत दिनों बाद कुछ अपडेट करते हैं और बॉल बॉउंड्री पार कर देते हैं बहुत बहुत शुक्रिया साँझा करने के लिए .
    मैंने भी इसी ख्याल मैं एक नज़्म लिखी थी कभी वक़्त होतो देखिएगा .लाइन्स भेज रहा हूँ



    http://themissedbeat.blogspot.com/2018/07/blog-post_30.html

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  6. तेरे बिन जो गुजरी जिन्दगी
    जिन्दा लेकिन बेदम जिन्दगी,
    आँख में पानी,गला भारी
    कांपते होठों से बोलती जिन्दगी,
    रात को सोती दुनियां जागता मैं
    एक कोने में बीमार पड़ी जिन्दगी,
    पहली किरन से लोगों की ये चहल पहल
    उगता सूरज और ये मेरी डूबती जिन्दगी,
    लाजवाब अभिव्यक्ति....
    वाह!!!

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  7. तेरे बिन जो गुजरी जिन्दगी
    जिन्दा लेकिन बेदम जिन्दगी,
    आँख में पानी,गला भारी
    कांपते होठों से बोलती जिन्दगी,
    रात को सोती दुनियां जागता मैं
    एक कोने में बीमार पड़ी जिन्दगी,
    पहली किरन से लोगों की ये चहल पहल
    उगता सूरज और ये मेरी डूबती जिन्दगी,
    लाजवाब अभिव्यक्ति....
    वाह!!!

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  8. बेहद खूबसूरत रचना

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  9. बहुत ही सुन्दर और भावपूर्ण रचना 🙏

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  10. बहुत ही सुन्दर और भावपूर्ण रचना

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  11. आदरनीय रोहित जी -- जैसा कि आपने रचना के परिचय में लिखा - आपकी सबसे पहली रचनाओं में से एक है और आपने लिखा कि उस समय आप लेखन कला से अनजान थे | आश्चर्य भी है और ख़ुशी भी कि आपने शुरुआत में ही जो लिखा वह शायद मन की गहराइयों का अनकहा संताप था जो रचना के माध्यम से अत्यंत उत्तम सृजन के रूप में शब्दांकित हुआ |किसी को अत्यंत भावपूर्ण उद्बोधन में शब्द -शब्द दर्द से बिंधा है और एक- एक शब्द से मन की वेदना निर्झर की तरह बहती है |पहली रचना होने से ये बहुत ही शानदार रचना है | मैं को साहित्य समीक्षक तो नहीं पर एक पाठक के तौर पर मुझे आपकी रचना बहुत ही मर्मस्पर्शी लगी | --
    तुम मुझ से जानो
    तेरे बिन जो गुजरी जिन्दगी
    जिन्दा लेकिन बेदम जिन्दगी,
    आँख में पानी,गला भारी
    कांपते होठों से बोलती जिन्दगी,
    रात को सोती दुनियां जागता मैं
    एक कोने में बीमार पड़ी जिन्दगी,
    पंक्तियाँ तो बहुत ही प्रभावी है और अन्तस् को छू जाती | सस्नेह शुभकामनायें |

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